Wednesday, May 28, 2025

जब मैं तुझे देखता हूं

जब मैं तुझे देखता हूं

तो यह सोचता हूं

कि यह देखना क्या है

और मैं किसे देखता हूं।


सृष्टि की हर एक चीज में

जानी पहचानी या अजीब में।


बेशक तुझे देखता हूँ

कुछ दूर से नजदीक से

स्वप्नों में या बाहों में।

पलको के द्वार पर 

या भीतर निगाहों में।

Tuesday, May 27, 2025

सवाली लगता है

यूँ अचानक खुद से खाली लगता है
तेरे दर से भटका सवाली लगता है।
फितरत से भोला औ' था बड़ा सीधा
तो अब क्यों सबको बवाली लगता है
है जिस शाख पर पंछियों की सरगम
मिला मौका तो काटने डाली लगता है।

Friday, May 16, 2025

सरकारी काम

विनय और धैर्य का अभय लगता है
सरकारी काम है समय लगता है।

Wednesday, May 14, 2025

भारी संदूक

उस शख्स के हाथ में बहुत भारी संदूक है
देख जिसकी कनपटी पर इस समय बंदूक है।
साजिशें सफलताएं या नाकामियों का बोझ है
क्या है जो बना आखिर जीवन का अवरोध है।

Tuesday, October 29, 2024

झूठ और सच

झूठ आकर्षक है इसे बोलने में कोई परेशानी नही
सच कड़वा है और प्यासा है इसके वास्ते पानी नही।

सच के वास्ते पानी नहीं

झूठ आकर्षक है —
बोलो, कोई हिचक नहीं।
बना लो कहानी,
सजा लो चेहरे,
लोग तालियाँ बजाएंगे।

सच…
वो तो प्यासा है।
उसके होंठ सूख चुके हैं
सदियों से।
उसे किसी ने
कभी बुलाया नहीं दावत में,
उसके वास्ते
कभी कोई गिलास नहीं रखा गया।

झूठ की मेज़ें भरी हैं,
सच सड़क किनारे बैठा है —
धूप में, धूल में,
अपने फटे कपड़ों में।

झूठ बोलो —
तो लोग कहते हैं,
"कितनी समझदारी है!"
सच कहो —
तो सवाल होता है,
"इतना कड़वा क्यों बोलते हो?"

सच को अब तर्क नहीं चाहिए,
उसे तो बस
एक लोटा पानी चाहिए —
पीने के लिए नहीं,
जिंदा रहने के लिए।

Friday, September 6, 2024

वह मिला मुझसे

जिसकी आहट पे आकुल थे अंतर नयन,
उसके जाने का कोई न शिकवा गिला।
वह मिला मुझसे जैसे न कोई मिला,
फिर गया छोड़ जैसे न कोई गया।

फूल, ख़ुशबू, हवा, ज़ुल्फ़, बादल मिले,
नम अधर, शबनमी तीखे काजल मिले।
हाथ थामे चला वह बहुत दूर तक,
फिर पलटकर न देखा, न कुछ भी कहा।

उसके लहजे में सावन की सरगम रही,
उसकी चुप्पी में मौसम की छाया बही।
हर लम्हा था जैसे कोई गीत था,
जो भी महसूस उसमें था, अल्फ़ाज़ क्या?

चाँदनी उसकी बातों में छुपकर मिली,
रात उसकी हँसी में मचलकर मिली।
मैंने समझा यही अब है सब कुछ मेरा,
पर वो यूँ छूट गया, जैसे सपना ढहा।

अब भी यादों में उसकी महक है बसी,
जैसे भीगी हुई एक दुआ रह गई।
वो मिला भी तो ऐसे, कि खो भी गया,
जैसे साया कभी साथ चलता रहा।

Thursday, May 23, 2024

क्यों

क्यों मेरे दिल की सदा तुम तक नही जाती
तुम्हारी आवाज कोई मुझ तक क्यों नही आती
हाँ तुमसे प्यार है जबसे मिला हूँ तुमसे
इतनी सी बात तुम्हें समझ में क्यों नही आती।

नज़्म: इतनी-सी बात

क्यों
मेरे दिल की सदा
तुम तक नहीं जाती?
क्यों
हर बार एक ख़ामोशी
तुम्हारे दरवाज़े पर
खटखटा कर लौट आती है?

मैं कहता हूँ —
हर रोज़, हर रात,
कभी हवा से,
कभी ख़्वाब से,
कभी अपने ही साये से —
कि हाँ,
मुझे तुमसे मोहब्बत है।

तब से
जबसे तुम्हें पहली बार देखा,
जब लफ़्ज़ नहीं थे,
पर नज़रें भर आई थीं।

मैंने कहा —
अपने आप से,
दुनिया से नहीं।
पर अब चाहता हूँ
तुमसे कहूँ —
सीधा,
साफ़,
बिना किसी डर के।

इतनी-सी बात है:
मुझे तुमसे प्यार है।

और
इतनी-सी बात
तुम्हें
समझ में क्यों नहीं आती?

क्या लहज़ा बदल दूँ?
या आवाज़ ऊँची करूँ?
या चुप ही रहूँ —
जैसे अब तक रहा हूँ?

पर तुम सुनो —
अगर कभी फुर्सत मिले
ख़ुद से,
या दुनिया से...
तो मेरी ख़ामोशियों को
पढ़ना ज़रा।

वहाँ तुम्हारा नाम लिखा है —
हर हरफ़ में।
वहाँ
मैं हूँ —
बस तुम्हारे लिए।