सच-झूठ की खोज में, बीता जीवनकाल।
प्रीति सही या रीति है, मन में रहा सवाल।।
उठ जाग मनुज प्रभात है,क्यों सोया मुँह बाय।
मकड़ी मुँह में आ गई,जाला दे न बनाय।।
ये कैसा तेरा सावन है
न बारिश है न झूले हैं
न पवन झकोरे रिमझिम है
न पनियारी के मेले हैं।
खेतों में पड़ गई दरारें
पानी पानी धरा पुकारे
दिन में धूप रात में गर्मी
शीतलता की राह निहारें
पोखर ताल तलैया सूखे
बदरा जैसे नभ से रूठे
कब बरसेगी कृपा तुम्हारी
कृषक इंद्रदेव से पूछे।
सूखे की नौबत आएगी
हरियाली सब खो जाएगी।
जब मैं तुझे देखता हूं
तो यह सोचता हूं
कि यह देखना क्या है
और मैं किसे देखता हूं।
सृष्टि की हर एक चीज में
जानी पहचानी या अजीब में।
बेशक तुझे देखता हूँ
कुछ दूर से नजदीक से
स्वप्नों में या बाहों में।
पलको के द्वार पर
या भीतर निगाहों में।