Saturday, June 28, 2025

मै तेरे शृंगार पर क्या लिखूंगा गीत कोई। 

प्रीत में डूबा हुआ हूँ क्या लिखूंगा रीत कोई। 

तुम ही मिले

तुम ही मिले

जब सुबह की खामोशी में
कोई खुशबू महकी धीमे से,
हवा ने नाम तेरा लिया
और दिल में गूंज उठी धड़कन
तुम ही मिले।

जब बगिया की चुप क्यारी में
कोई फूल खिला बिन बोले,
मैंने देखा, कुछ भी न कहा
पर उसकी मुस्कान में
तुम ही मिले।

एक अजनबी जब गीत कोई
गुनगुनाने लगा राह में,
लफ़्ज़ कुछ अनजाने थे
पर धुन में छुपे हुए
तुम ही मिले।

जब मन प्यासा था शब्दों से
और ख्यालों में एक तड़प थी,
हर अर्थ की गहराई में
एक बूंद बनकर
तुम ही मिले।

वक़्त ने जितने नक्शे बदले,
कितनी घड़ियाँ गुज़रीं चुपचाप,
पर मेरी प्रतीक्षा की हर साँझ में
ख़्वाब बनकर
तुम ही मिले।

तुम कभी नहीं आए सीधे,
पर हर मोड़ ने इशारा किया,
हर साया, हर हलकी सी आहट में
धीरे-धीरे
तुम ही मिले।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत' @काव्य अपराजिता 

Friday, June 27, 2025

मुकदमा

युगों के अंतराल में बहुत बड़ा सदमा है
झूठ की अदालत में सच का मुकदमा है।

Thursday, June 26, 2025

स्त्रियां

सबसे बड़ा व्यभिचारी

मनुष्य से बड़ा
व्यभिचारी
शायद ही कोई और
जीव होगा इस पृथ्वी पर।

जानवर
नंगे पैदा होते हैं,
नंगे जीते हैं,
नंगे मरते हैं —
फिर भी
उनका मन निर्वस्त्र नहीं होता।

मनुष्य
छुपता है —
वस्त्रों में,
नियमों में,
धर्म के पर्दों में,
और फिर भी
उसी पर्दे के पीछे
सबसे ज़्यादा
भटकता है।

कुत्ते के गले में पट्टा,
बैल के गले में घंटी,
घोड़े के पाँव में नाल —
यह
मनुष्य की सभ्यता है।

सभ्यता —
जिसने आज़ादी को
नियमों में बाँध दिया,
और फिर
उन नियमों को
अपने हित के लिए
तोड़ भी दिया।

मनुष्य ही है
जो पंछियों को पिंजरे में
खूबसूरती कहकर
कैद कर सकता है।
जानवरों की खाल पहनकर
इंसान होने का
गौरव महसूस कर सकता है।

और वही मनुष्य —
स्त्री के शरीर से डरता है।
वो स्त्री,
जो सदियों से
भाई, बेटा, भतीजा, देवर, ससुर, चाचा,
सबके सामने
सहज खड़ी रही।

लेकिन पुरुष —
उसे आंशिक अनावृत्त देखकर
भी
सहज नहीं हो सका।

वो अपनी दुर्बलता को
"चरित्रहीनता" कहकर
जायज़ ठहराता रहा।
और शब्द गढ़ता गया —
"व्यभिचार", "संस्कार", "मर्यादा"।

इसलिए
कभी चाचा, कभी मामा,
कभी भाई,
और आजकल
बाप भी।

कितनी विडंबना है —
कि सीमाएँ गढ़ने वाला मनुष्य
सीमाओं को ही लांघता रहा।

जबकि
जो सीमाओं से बाहर है,
वही तो
परमात्मा है।

तू वही है

वहीं है

लगता नहीं
कि तू कहीं गई है।
दरवाज़ा अब भी
तेरी आहट से चौंकता है।
खिड़की पर धूप
वैसे ही बैठी रहती है
जैसे तुझे देखने आई हो।

चाय का प्याला
अब भी दो रखा जाता है,
एक पी लेती है तन्हाई,
एक रह जाता है —
तेरे हिस्से की चुप्पी बनकर।

घड़ी चलती है,
दिन बदलते हैं,
पर ज़िंदगी...
जहाँ थी
वहीं है।

तेरे जाने के बाद
सब कुछ थम तो नहीं गया,
पर
कुछ भी चल नहीं रहा।

Wednesday, June 25, 2025

दोहा

सच-झूठ की खोज में, बीता जीवनकाल।
प्रीति सही या रीति है, मन में रहा सवाल।।

उठ जाग मनुज प्रभात है,क्यों सोया मुँह बाय।
मकड़ी मुँह में आ गई,जाला दे न बनाय।।

Saturday, June 21, 2025

लालटेन युग

रोजमर्रा की तरह आज भी समय से दफ्तर पहुंच गया।अभी कुर्सी पर बैठा ही था कि एक तीव्र स्वर गूंजा- नमस्कार साहब आप तो रोशनी में AC में बैठे हैं और बाहर लालटेन युग का बवाल मचा रखा है। मैं चौका नज़र उठाई तो देखा एक आगुन्तक नमस्कार की मुद्रा में दरवाजे पर खड़े हैं।मैंने कहा आइये बैठिए पहले अपना परिचय तो दीजिए फिर आगे बात करते हैं।आप वर्मा जी हैं ना...? मैंने कहाँ जी हाँ....मैं देवेंद्र प्रताप वर्मा...। हम विजय मोहन है..शायद आपने नाम सुना होगा।हमारा जूतों का कारोबार है,लगभग 80-90 करोड़ का टर्न ओवर है सालाना हमारा।विधायक जी ने परिचय दिया होगा हमारा...विधायक जी का फोन आया होगा आपके पास।जी हाँ फोन आया था...उन्होंने बताया आपके बारे में।बताइए मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ।अरे हुज़ूर आप चाहे तो क्या नही कर सकते हैं..जलवा तो बस आपका ही है...बहुत छोटा सा काम है...गीतांजलिपुरम कॉलोनी है न..उसी के पास अपनी एक जमीन है ..उस पर बिजली के कुछ खंभे लगे हैं वही हटवा दीजिए। ठीक है आप एक प्रार्थना पत्र दे दीजिए...मैं संबंधित अवर अभियंता से सर्वे कराकर उसका एस्टीमेट बनवा देता हूँ..एस्टीमेट के प्रशासनिक अनुमोदन के बाद आप एस्टीमेट की धनराशि जमा करा दीजिएगा। आप का काम अविलंब हो जाएगा।अरे इंजीनियर साहब कहाँ एस्टीमेट के चक्कर में उलझा रहे हैं..एस्टीमेट ही बनना होता तो विधायक जी से काहे फ़ोन कराते।आप अपने स्तर से करा दीजिए। देखिए भाई साहब हमारा और कोई स्तर नही है.जब कुछ नियमानुसार ही होगा।....तो मतलब आप हमारा काम नही करेंगे..जी मैंने ऐसा तो बिल्कुल नही कहा..दो दिन का समय दीजिए...एस्टीमेट बनवा देता हूँ...उसके बाद प्रशासनिक अनुमोदन लेकर आपका का काम करवा दूंगा ..जल्द से जल्द...वही तो कह रहा हूँ...विधायक जी की बात का मान भी नही रख रहे आप तो...एस्टीमेट का पैसा हम नही देंगे...आप बिना एस्टीमेट के करवा सकते हैं तो बताइए नही तो मैं आपके सीनियर से बात करता हूँ।....बेशक आप बात कर लीजिए..लेकिन काम होगा तो नियम से ही होगा...।आपकी इसी नियमानुसार कार्यवाही के चक्कर में विभाग का निजीकरण हो रहा है..आप से बेहतर तो प्राइवेट वाले हैं तुरंत काम हो जाता है...और आप लोग दुनियाभर का नियम कानून बता कर आम जनता को गुमराह करते हैं..।सोशल मीडिया से लेकर अखबार तक लालटेन युग की अफवाह उड़ाकर तुम लोग अपनी काली कमाई और रिश्वतखोरी को बचाना चाहता हो...सरकार ठीक कर रही है...सब प्राइवेट हो जाना चाहिए।यह कहते हुए उन महोदय के चेहरे पर एक अजब सी चमक आ गई और उनका स्वर तेज हो गया मानो युद्ध से पहले ही विजयी घोषित कर दिए गए हों..