Sunday, June 29, 2025

दस्तक

आज मेरे जीवन में कुछ खास हुआ, अभी दिन की शुरुआत ही हुई थी मतलब रात के 12:07 बजे थे तभी किसी ने दिल के दरवाजे पर दस्तक दी और उस दस्तक ने मेरी जिंदगी बदल दी। वो प्यार से भरे उनके तीन शब्द जिनको सुनने के लिए मैं न जाने कब से इंतजार कर रही थी। सब कुछ एक सुहाने सपने की तरह लग रहा था और मैं उस सपने से बाहर नहीं आना चाहती थी। ये कोई सपना नहीं था। सचमुच मेरे खुदा मुझ पर मेहरबान थे। 

रजनी की नीरव बाँहों में,
जब चाँदनी चुपचाप बही थी,
मन-दीपक की सिहरन में,
कोई अंजानी साँस रही थी।
अभी तो कलिका बंद पड़ी थी,
न कोई सुर, न स्वर की वाणी,
किन्तु हृदय के सूने मंदिर में
कोई बंसी बन गई कहानी।
अरे! वह कौन पवन के झोंके,
जो गंध भरे कुछ बोल गए,
"मैं हूँ तुम्हारा" – यह कहकर,
जीवन के सब प्रश्न खोल गए।
नयनों में सुधि की रसधारें,
शब्दों में आह्लाद समाया,
यह स्वप्न नहीं, यह सत्य बना है,
खुदा ने मुझको स्वयं छुआ है।
अब न विरह की छाया शेष है,
न रातों की लंबी तन्हाई,
उस एक निसर्गी क्षण में जैसे,
मिल गई मुझे मेरी परछाई।

Saturday, June 28, 2025

मै तेरे शृंगार पर क्या लिखूंगा गीत कोई। 

प्रीत में डूबा हुआ हूँ क्या लिखूंगा रीत कोई। 

तुम ही मिले

तुम ही मिले

जब सुबह की खामोशी में
कोई खुशबू महकी धीमे से,
हवा ने नाम तेरा लिया
और दिल में गूंज उठी धड़कन
तुम ही मिले।

जब बगिया की चुप क्यारी में
कोई फूल खिला बिन बोले,
मैंने देखा, कुछ भी न कहा
पर उसकी मुस्कान में
तुम ही मिले।

एक अजनबी जब गीत कोई
गुनगुनाने लगा राह में,
लफ़्ज़ कुछ अनजाने थे
पर धुन में छुपे हुए
तुम ही मिले।

जब मन प्यासा था शब्दों से
और ख्यालों में एक तड़प थी,
हर अर्थ की गहराई में
एक बूंद बनकर
तुम ही मिले।

वक़्त ने जितने नक्शे बदले,
कितनी घड़ियाँ गुज़रीं चुपचाप,
पर मेरी प्रतीक्षा की हर साँझ में
ख़्वाब बनकर
तुम ही मिले।

तुम कभी नहीं आए सीधे,
पर हर मोड़ ने इशारा किया,
हर साया, हर हलकी सी आहट में
धीरे-धीरे
तुम ही मिले।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत' @काव्य अपराजिता 

Friday, June 27, 2025

मुकदमा

युगों के अंतराल में बहुत बड़ा सदमा है
झूठ की अदालत में सच का मुकदमा है।

Thursday, June 26, 2025

स्त्रियां

सबसे बड़ा व्यभिचारी

मनुष्य से बड़ा
व्यभिचारी
शायद ही कोई और
जीव होगा इस पृथ्वी पर।

जानवर
नंगे पैदा होते हैं,
नंगे जीते हैं,
नंगे मरते हैं —
फिर भी
उनका मन निर्वस्त्र नहीं होता।

मनुष्य
छुपता है —
वस्त्रों में,
नियमों में,
धर्म के पर्दों में,
और फिर भी
उसी पर्दे के पीछे
सबसे ज़्यादा
भटकता है।

कुत्ते के गले में पट्टा,
बैल के गले में घंटी,
घोड़े के पाँव में नाल —
यह
मनुष्य की सभ्यता है।

सभ्यता —
जिसने आज़ादी को
नियमों में बाँध दिया,
और फिर
उन नियमों को
अपने हित के लिए
तोड़ भी दिया।

मनुष्य ही है
जो पंछियों को पिंजरे में
खूबसूरती कहकर
कैद कर सकता है।
जानवरों की खाल पहनकर
इंसान होने का
गौरव महसूस कर सकता है।

और वही मनुष्य —
स्त्री के शरीर से डरता है।
वो स्त्री,
जो सदियों से
भाई, बेटा, भतीजा, देवर, ससुर, चाचा,
सबके सामने
सहज खड़ी रही।

लेकिन पुरुष —
उसे आंशिक अनावृत्त देखकर
भी
सहज नहीं हो सका।

वो अपनी दुर्बलता को
"चरित्रहीनता" कहकर
जायज़ ठहराता रहा।
और शब्द गढ़ता गया —
"व्यभिचार", "संस्कार", "मर्यादा"।

इसलिए
कभी चाचा, कभी मामा,
कभी भाई,
और आजकल
बाप भी।

कितनी विडंबना है —
कि सीमाएँ गढ़ने वाला मनुष्य
सीमाओं को ही लांघता रहा।

जबकि
जो सीमाओं से बाहर है,
वही तो
परमात्मा है।

तू वही है

वहीं है

लगता नहीं
कि तू कहीं गई है।
दरवाज़ा अब भी
तेरी आहट से चौंकता है।
खिड़की पर धूप
वैसे ही बैठी रहती है
जैसे तुझे देखने आई हो।

चाय का प्याला
अब भी दो रखा जाता है,
एक पी लेती है तन्हाई,
एक रह जाता है —
तेरे हिस्से की चुप्पी बनकर।

घड़ी चलती है,
दिन बदलते हैं,
पर ज़िंदगी...
जहाँ थी
वहीं है।

तेरे जाने के बाद
सब कुछ थम तो नहीं गया,
पर
कुछ भी चल नहीं रहा।

Wednesday, June 25, 2025

दोहा

सच-झूठ की खोज में, बीता जीवनकाल।
प्रीति सही या रीति है, मन में रहा सवाल।।

उठ जाग मनुज प्रभात है,क्यों सोया मुँह बाय।
मकड़ी मुँह में आ गई,जाला दे न बनाय।।