सच कड़वा है और प्यासा है इसके वास्ते पानी नही।
सच के वास्ते पानी नहीं
झूठ आकर्षक है —
बोलो, कोई हिचक नहीं।
बना लो कहानी,
सजा लो चेहरे,
लोग तालियाँ बजाएंगे।
सच…
वो तो प्यासा है।
उसके होंठ सूख चुके हैं
सदियों से।
उसे किसी ने
कभी बुलाया नहीं दावत में,
उसके वास्ते
कभी कोई गिलास नहीं रखा गया।
झूठ की मेज़ें भरी हैं,
सच सड़क किनारे बैठा है —
धूप में, धूल में,
अपने फटे कपड़ों में।
झूठ बोलो —
तो लोग कहते हैं,
"कितनी समझदारी है!"
सच कहो —
तो सवाल होता है,
"इतना कड़वा क्यों बोलते हो?"
सच को अब तर्क नहीं चाहिए,
उसे तो बस
एक लोटा पानी चाहिए —
पीने के लिए नहीं,
जिंदा रहने के लिए।