Monday, July 3, 2023

बात

कहाँ से चली थी और कहाँ जा के पहुंची
वो क्या बात थी और क्या बन के पहुंची।

क्या बात थी…


कहाँ से चली थी —

और कहाँ जा के पहुँची।

वो क्या बात थी —

और क्या बन के पहुँची।


शायद

एक भावना थी,

एक चाह,

या कोई बहुत छोटी-सी उम्मीद,

जो शब्द बनकर निकली थी

किसी दिल से…


रास्ते में

वक़्त मिला,

लोग मिले,

मायने बदले।


कुछ जोड़ा गया,

कुछ छूटा भी —

और जब वो पहुँची

किसी और दिल तक —

तो वो

वही बात नहीं रही।


कभी कोई रिश्ता भी

यही सफ़र करता है।

शुरू कुछ और होता है —

मासूम, सहज,

जैसे ओस की बूँद।


और जब तक

वो मंज़िल पर पहुँचता है —

कई चेहरे पहन चुका होता है।


अब पहचान में नहीं आता।


तो पूछता हूँ —

क्या वो "बात" ग़लत थी

या "सफ़र" कुछ ज़्यादा लंबा हो गया?

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