कहाँ से चली थी और कहाँ जा के पहुंची
वो क्या बात थी और क्या बन के पहुंची।
क्या बात थी…
कहाँ से चली थी —
और कहाँ जा के पहुँची।
वो क्या बात थी —
और क्या बन के पहुँची।
शायद
एक भावना थी,
एक चाह,
या कोई बहुत छोटी-सी उम्मीद,
जो शब्द बनकर निकली थी
किसी दिल से…
रास्ते में
वक़्त मिला,
लोग मिले,
मायने बदले।
कुछ जोड़ा गया,
कुछ छूटा भी —
और जब वो पहुँची
किसी और दिल तक —
तो वो
वही बात नहीं रही।
कभी कोई रिश्ता भी
यही सफ़र करता है।
शुरू कुछ और होता है —
मासूम, सहज,
जैसे ओस की बूँद।
और जब तक
वो मंज़िल पर पहुँचता है —
कई चेहरे पहन चुका होता है।
अब पहचान में नहीं आता।
तो पूछता हूँ —
क्या वो "बात" ग़लत थी
या "सफ़र" कुछ ज़्यादा लंबा हो गया?
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