मुश्किलों से जो मिला तजुर्बा बहुत खास है
वो जो सबसे दूर है वही तो सबसे पास है।
सबसे पास
मुश्किलों से
जो मिला तजुर्बा —
बहुत खास है।
वो किताबों से नहीं,
ज़ख़्मों से निकला है।
हर ठोकर,
हर ठंडी रात,
हर लंबा इंतज़ार —
एक अध्याय बन गया
मेरे भीतर।
अब जब देखता हूँ
ज़िंदगी को
तो समझ आता है —
कि जो दिखता नहीं,
वही सबसे गहरा होता है।
और
वो जो सबसे दूर है —
वही तो
सबसे पास है।
वो सपना,
जो कभी सच नहीं हुआ,
पर अब भी हर रोज़
साँस लेता है मेरे भीतर।
वो इंसान,
जो अब नाम तक नहीं लेता,
पर हर ख़ामोशी में
उसी की आवाज़ होती है।
वो सुख,
जो कभी मिला ही नहीं,
पर हर दुःख को
ढाँप लेता है जैसे कोई याद।
तजुर्बा यही सिखाता है —
कि दूरी मापी नहीं जाती
क़दमों से,
बल्कि
दिल की धड़कनों से।
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