Thursday, May 23, 2024

क्यों

क्यों मेरे दिल की सदा तुम तक नही जाती
तुम्हारी आवाज कोई मुझ तक क्यों नही आती
हाँ तुमसे प्यार है जबसे मिला हूँ तुमसे
इतनी सी बात तुम्हें समझ में क्यों नही आती।

नज़्म: इतनी-सी बात

क्यों
मेरे दिल की सदा
तुम तक नहीं जाती?
क्यों
हर बार एक ख़ामोशी
तुम्हारे दरवाज़े पर
खटखटा कर लौट आती है?

मैं कहता हूँ —
हर रोज़, हर रात,
कभी हवा से,
कभी ख़्वाब से,
कभी अपने ही साये से —
कि हाँ,
मुझे तुमसे मोहब्बत है।

तब से
जबसे तुम्हें पहली बार देखा,
जब लफ़्ज़ नहीं थे,
पर नज़रें भर आई थीं।

मैंने कहा —
अपने आप से,
दुनिया से नहीं।
पर अब चाहता हूँ
तुमसे कहूँ —
सीधा,
साफ़,
बिना किसी डर के।

इतनी-सी बात है:
मुझे तुमसे प्यार है।

और
इतनी-सी बात
तुम्हें
समझ में क्यों नहीं आती?

क्या लहज़ा बदल दूँ?
या आवाज़ ऊँची करूँ?
या चुप ही रहूँ —
जैसे अब तक रहा हूँ?

पर तुम सुनो —
अगर कभी फुर्सत मिले
ख़ुद से,
या दुनिया से...
तो मेरी ख़ामोशियों को
पढ़ना ज़रा।

वहाँ तुम्हारा नाम लिखा है —
हर हरफ़ में।
वहाँ
मैं हूँ —
बस तुम्हारे लिए।

Wednesday, May 22, 2024

अपनी अपनी जिंदगी

वास्ते

अपनी-अपनी ज़िंदगी है,
अपने-अपने रास्ते।
मैं — किसी के वास्ते,
तू — भी किसी के वास्ते।

हम दोनों चलते हैं
अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर,
जैसे दो समानांतर रेखाएँ
जो कभी मिलती नहीं,
पर साथ चलती हैं...
बहुत दूर तक।

मगर —
अगर मुमकिन हो,
तो एक मोड़ पर
एक पल के लिए
रुकना।

देखना —
क्या हम
अपने-अपने 'वास्ते' छोड़कर
एक-दूसरे के हो सकते हैं?

क्या मैं
सिर्फ़ तेरे वास्ते हो सकूँ,
और तू —
सिर्फ़ मेरे वास्ते?

शायद नहीं।
शायद हाँ।
पर उस शायद की संभावना में
एक कविता तो रह सकती है।