तुम्हारी आवाज कोई मुझ तक क्यों नही आती
हाँ तुमसे प्यार है जबसे मिला हूँ तुमसे
इतनी सी बात तुम्हें समझ में क्यों नही आती।
नज़्म: इतनी-सी बात
क्यों
मेरे दिल की सदा
तुम तक नहीं जाती?
क्यों
हर बार एक ख़ामोशी
तुम्हारे दरवाज़े पर
खटखटा कर लौट आती है?
मैं कहता हूँ —
हर रोज़, हर रात,
कभी हवा से,
कभी ख़्वाब से,
कभी अपने ही साये से —
कि हाँ,
मुझे तुमसे मोहब्बत है।
तब से
जबसे तुम्हें पहली बार देखा,
जब लफ़्ज़ नहीं थे,
पर नज़रें भर आई थीं।
मैंने कहा —
अपने आप से,
दुनिया से नहीं।
पर अब चाहता हूँ
तुमसे कहूँ —
सीधा,
साफ़,
बिना किसी डर के।
इतनी-सी बात है:
मुझे तुमसे प्यार है।
और
इतनी-सी बात
तुम्हें
समझ में क्यों नहीं आती?
क्या लहज़ा बदल दूँ?
या आवाज़ ऊँची करूँ?
या चुप ही रहूँ —
जैसे अब तक रहा हूँ?
पर तुम सुनो —
अगर कभी फुर्सत मिले
ख़ुद से,
या दुनिया से...
तो मेरी ख़ामोशियों को
पढ़ना ज़रा।
वहाँ तुम्हारा नाम लिखा है —
हर हरफ़ में।
वहाँ
मैं हूँ —
बस तुम्हारे लिए।
No comments:
Post a Comment