Friday, September 6, 2024

वह मिला मुझसे

जिसकी आहट पे आकुल थे अंतर नयन,
उसके जाने का कोई न शिकवा गिला।
वह मिला मुझसे जैसे न कोई मिला,
फिर गया छोड़ जैसे न कोई गया।

फूल, ख़ुशबू, हवा, ज़ुल्फ़, बादल मिले,
नम अधर, शबनमी तीखे काजल मिले।
हाथ थामे चला वह बहुत दूर तक,
फिर पलटकर न देखा, न कुछ भी कहा।

उसके लहजे में सावन की सरगम रही,
उसकी चुप्पी में मौसम की छाया बही।
हर लम्हा था जैसे कोई गीत था,
जो भी महसूस उसमें था, अल्फ़ाज़ क्या?

चाँदनी उसकी बातों में छुपकर मिली,
रात उसकी हँसी में मचलकर मिली।
मैंने समझा यही अब है सब कुछ मेरा,
पर वो यूँ छूट गया, जैसे सपना ढहा।

अब भी यादों में उसकी महक है बसी,
जैसे भीगी हुई एक दुआ रह गई।
वो मिला भी तो ऐसे, कि खो भी गया,
जैसे साया कभी साथ चलता रहा।

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