वास्ते
अपनी-अपनी ज़िंदगी है,
अपने-अपने रास्ते।
मैं — किसी के वास्ते,
तू — भी किसी के वास्ते।
हम दोनों चलते हैं
अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर,
जैसे दो समानांतर रेखाएँ
जो कभी मिलती नहीं,
पर साथ चलती हैं...
बहुत दूर तक।
मगर —
अगर मुमकिन हो,
तो एक मोड़ पर
एक पल के लिए
रुकना।
देखना —
क्या हम
अपने-अपने 'वास्ते' छोड़कर
एक-दूसरे के हो सकते हैं?
क्या मैं
सिर्फ़ तेरे वास्ते हो सकूँ,
और तू —
सिर्फ़ मेरे वास्ते?
शायद नहीं।
शायद हाँ।
पर उस शायद की संभावना में
एक कविता तो रह सकती है।
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