बहुत सालों के बाद मिला मैं अपनी यादों में उभरते हंसी के मनमोहक अपने पुराने मित्र से।बेहद मुरझाया टूटा बेआस था जाने कब से तन्हा और उदास था। मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसकी आँखों में आँसू छलक आए और वह बिलख कर रो पड़ा। मै बहुत हैरान हुआ कि अचानक उसे क्या हो गया। वो तो बहुत बहादुर था ऐसे क्यों रो रहा है ? मैंने पूछा मित्र अपनी वेदना कहो। वो नम आँखों से बोला सुनो मेरे प्यारे दोस्त मैंने जीवन के नैतिक मूल्यों और सदाचार की शिक्षा पाई है। मेरा हृदय साहस से भरा हुआ है। मै अपने देश, अपने समाज और अपने कुल की सेवा करना चाहता हूँ। समाज में फैले अन्याय और जुल्म से लड़ना चाहता हूँ । नारी की सुरक्षा करना चाहता हूँ । यही मेरे जीवन का उद्देश्य है। मेरे माता-पिता और गुरुजनों की यही सीख है। मैंने कहा तो इसमें रुदन की क्या बात है ? वो बोला एक दिन की बात बताऊँ मै अपने घर से रात में टहलने के लिए निकला था। चाँदनी रात कि खामोशी में गुनगुनाते हुए काफी दूर निकल आया था मुझे पता ही नहीं चला। अचानक नुक्कड़ की गली के पास जहां कुछ अंधेरा था,वहाँ से मैंने एक स्त्री की चीखने की आवाज सुनी मैं बिना एक पल गंवाए वहाँ पहुंचा तो देखा कि कुछ लड़के एक लड़की को जबरन खींचकर गली के भीतर ले जा रहे थे। लड़की के कपड़े फटे और बाल बिखरे हुए थे। वो मदद के लिए पुकार रही थी। मैंने उन पापियों को ललकारा छोड़ दो इस लड़की को। वे मेरे पास आए और चाकू निकाल कर मेरी गर्दन पर लगा दी और कहा कि भाग जा वरना जान से मार दिये जाओगे। मैंने उनके हाथ से चाकू छीनने का प्रयास किया लेकिन मै असफल रहा। वो लड़की का मुंह दबाये गली के अंदर ले गए, वहाँ उन्होने लड़की को निर्वस्त्र कर उसकी अस्मिता को तार तार कर दिया। वो रोती रही और मदद के लिए पुकारती रही लेकिन मैं जड़ बना भय से खड़ा रहा। मै उस लड़की का अपराधी हूँ। मैं उसे बचा सकता था लेकिन भय के कारण मैं कुछ नहीं कर पाया। मेरी हिम्मत, मेरे संस्कार, मेरी शिक्षा, अन्याय से लड़ने का मेरा संकल्प सब धरा का धरा रह गया। मैं स्वयं से नजरें नहीं मिला पा रहा हूँ। जब भी किसी लड़की को देखता हूँ तो मुझे वही लड़की दिखाई देती है। घोर निराशा और आत्मग्लानि में डूबा हुआ अपने जीवन को समाप्त कर लेना चाहता हूँ । धिक्कार है मुझे पुरुष होने पर। धिक्कार है मेरी शिक्षा को। धिक्कार है मेरे आत्मबल को। धिक्कार है मेरे संकल्प को। हे ईश्वर मैं मृत्यु को क्यों नहीं प्राप्त हो जाता।
"मैं अपराधी हूँ"
बहुत वर्षों के बाद मिला,
यादों में बसी एक हँसी सी झलक,
मेरा प्रिय पुराना मित्र,
था मौन... पर भीतर गहरी हलचल थी।
चेहरे पर थकान, आँखों में पानी,
जैसे कोई तूफ़ान सदी पुराना,
मैं कुछ पूछ पाता उससे पहले,
वो बिलख पड़ा — मानो टूटा कोई सपना।
कहा —
"मैंने सीखे थे जीवन के सबक,
संस्कार, धर्म, साहस और सच्चाई।
चाहा था लड़ना अन्याय से,
बनना समाज की ढाल, देश की परछाई।"
"पर एक रात...
जब चाँदनी चुप थी, गली सुनसान थी,
एक चीख फटी — किसी बेटी की जान थी।
मैं पहुँचा, देखा — कुछ दरिंदे,
खींच रहे थे उसे अंधेरे की ओर।"
"मैंने ललकारा —
रुको, छोड़ो, यह पाप है!
पर उन्होंने चाकू दिखाया, कहा —
भाग वरना मौत सामने खड़ी है।"
"मैं डरा...
मैं कांपा...
मैं... खड़ा रहा जड़ बन,
और वे उसे नोचते रहे, रौंदते रहे,
उसकी चीखें... अब भी मेरे कानों में गूंजती हैं।"
"मैं अपराधी हूँ उसका —
उसकी अस्मिता का, उसके आँसुओं का,
उस उम्मीद का जो उसकी आँखों में थी,
जिसे मैं बचा सकता था... पर बचा न सका।"
"अब जब भी देखता हूँ किसी बहन को,
माँ को, बेटी को या स्त्री को —
वही चेहरा उभर आता है।
मैं मर चुका हूँ...
पर साँसें अब भी चल रही हैं।"
"धिक्कार है मुझे —
मेरे संस्कारों को,
मेरी शिक्षा को,
मेरे पुरुषार्थ को,
धिक्कार है इस जीवन को,
जो केवल भय में जिया गया।"
"प्रायश्चित"
हे ईश्वर!
यदि तू सुनता है,
तो एक बार अवसर दे —
या तो मैं उस जैसे लाखों को बचा सकूँ,
या मेरी मृत्यु ही मेरी मुक्ति बने।
"मैं दोषी हूँ — उसकी चीखों का"
बहुत वर्षों बाद मिला था
वो बचपन का सखा — मुस्कान लिए,
पर आँखों के कोनों में
एक समंदर ठहरा था...
जैसे जीवन की राख में कोई चिंगारी दबी हो।
मैं कुछ कहता,
उससे पहले ही वह फूट पड़ा,
जैसे वर्षों से थमी हुई पीड़ा
अब बाँध तोड़ रही हो।
“सुनो मित्र...
मैं अधम हूँ, नीच हूँ,
मैं पुरुष होकर भी,
पुरुषार्थ का शव हूँ।”
“मुझे याद है वह रात...
सन्नाटा चीख रहा था,
और चाँदनी —
किसी पाप की गवाही दे रही थी।
मैं टहलते-टहलते पहुँचा एक अंधेरी गली तक,
जहाँ इंसानियत की साँसे रुक रही थीं…”
“एक लड़की...
चीख रही थी, फटे कपड़े, बिखरे बाल,
रोती, तड़पती, काँपती हुई,
कुछ दरिंदों ने उसे घसीटा,
और मैं... मैं देखता रहा…”
“मैंने साहस दिखाने की सोची,
पर गर्दन पर चाकू था,
और दिल में — डर का कीड़ा
जिसने मेरी आत्मा को कुतर डाला।”
“वो रोती रही,
उसके नाखून ज़मीन खुरचते रहे,
उसकी आँखों में गिड़गिड़ाहट थी,
‘कोई है...? कोई है जो मुझे बचाए?’
हाँ... मैं था।
पर मैं ‘कोई’ नहीं बन पाया।”
“मैं उसके साथ मर गया उस रात,
हर दिन मेरी आत्मा पर उसका रक्त टपकता है।
जब भी कोई बहन दिखती है,
वो चेहरा सामने आ जाता है —
लहूलुहान, टूटी अस्मिता, और मैं...
मैं वहीं खड़ा हूँ — अब भी —
जड़, निष्क्रिय, बेआवाज़।”
“धिक्कार है मेरे ज्ञान को,
जिसने सिर्फ शब्द दिए, कर्म नहीं।
धिक्कार है उस साहस को,
जो डर की पहली आहट में मुँह मोड़ गया।
धिक्कार है इस जीवन को,
जो खुद को पुरुष कहता है...”
"हे ईश्वर..."
“अब तू ही बता —
क्या तू मुझे क्षमा कर सकेगा?
क्या मेरी आत्मा कभी चैन पाएगी?”
“मुझे जीवन नहीं चाहिए,
मुझे प्रायश्चित भी नहीं चाहिए,
मुझे बस वो क्षण वापस चाहिए —
जहाँ मैं कुछ कर सकता था…
और मैंने कुछ नहीं किया।”
"मैं उसका अपराधी हूँ…"
उसकी चीखें अब मेरी प्रार्थना हैं,
उसका रक्त मेरी आत्मा का पानी बन चुका है,
और मेरी हर साँस —
मेरी कायरता की सज़ा।
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