ऋषभ (परिषद को संबोधित करते हुए):
“आज हमने ठहराया कि अमाया अब परिषद की सदस्य नहीं, हमारी जीवित देवी होंगी।
पर यह केवल शब्दों से पूरा नहीं होगा।
समाज को यह मानना होगा कि यह आशीर्वाद देवताओं की इच्छा है।
इसके लिए एक विशेष आयोजन होगा।
मातृदेवी के मंदिर में एक वेदी बनाई जाएगी।
अमाया को लाल और हरे वस्त्र पहनाए जाएँगे।
उनके माथे पर तिलक और गले में मातृदेवी का प्रतीक रखा जाएगा।
हर परिवार अपने अन्न का अंश उनके चरणों में अर्पित करेगा।
परिषद के नए नियम देवी अमाया के आशीर्वाद से घोषित किए जाएँगे।”
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भैरव (सहमति जताते हुए):
“हाँ, ऐसा आयोजन समाज में विश्वास जगाएगा।
लोगों को लगेगा कि परिषद के नियम मानव के नहीं,
देवी के आदेश हैं।”
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अर्जन (कुटिल मुस्कान के साथ):
“और जब लोग पूछेंगे कि विवाह और वंश के नए नियम किसने बनाए,
हम कहेंगे — देवी अमाया की छाया में।
कोई विरोध नहीं उठेगा।”
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अमाया (धीरे स्वर में, स्वगत):
“वे मुझे देवी बनाकर मेरे शब्द छीनना चाहते हैं।
पर मैं जानती हूँ — मौन भी बोलता है।
आज जो बीज वे बो रहे हैं,
वह कल उनके ही लिए काँटा बनेगा।”
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