Friday, September 5, 2025

अध्याय 0d

अध्याय 0D – देवी का षड्यंत्र


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दृश्य 1 – गुप्त आग के चारों ओर

रात गहरी है। गाँव के बाहर नदी किनारे पुरुषों का एक दल अग्नि के चारों ओर बैठा है।
आग की लपटें चेहरों पर पड़ रही हैं। हवा में तनाव और फुसफुसाहट है।

ऋषभ (धीरे-धीरे):
“अमाया को सीधे हटाना असंभव है।
वह स्त्रियों की आत्मा है।
कोई भी स्त्री उसके विरुद्ध नहीं जाएगी।
पर यदि वह परिषद में रही तो पुरुषों की आवाज़ कभी नहीं सुनी जाएगी।
हमें रास्ता ढूँढना होगा।”

भैरव:
“पर परिषद से उसे बाहर कैसे करें?
यदि हम जबरन हटाएँगे तो बगावत होगी।”

ऋषभ (आँखों में चमक):
“बाहर नहीं करेंगे, ऊपर उठाएँगे।
उसे देवी बना देंगे।
देवी की पूजा होगी, पर निर्णय नहीं।
वह प्रतिमा होगी, हम नियम बनाएँगे।
स्त्रियाँ सोचेंगी कि उनकी अमाया सबसे ऊँचे स्थान पर है।”

पुरुषों के चेहरों पर धीरे-धीरे सहमति उभरती है।
यह षड्यंत्र ठोस रूप लेने लगता है।


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दृश्य 2 – परिषद का आरंभ

अगली सुबह।
मध्य में मातृदेवी की प्राचीन मूर्ति, चारों ओर दीपक टिमटिमा रहे हैं।
स्त्रियाँ वृत्त में बैठी हैं, पुरुष आदर से किनारे खड़े।

ऋषभ आगे बढ़ता है, हाथ जोड़कर मूर्ति के सामने झुकता है।

ऋषभ:
“मातृदेवी हमारी सभ्यता की आत्मा हैं।
धरती की तरह वह सबको धारण करती हैं,
जल की तरह प्यास बुझाती हैं,
अग्नि की तरह अंधकार को हराती हैं।
देवी नियम नहीं बनातीं,
देवी केवल आशीर्वाद देती हैं।

और क्या यह सत्य नहीं कि अमाया ने अब तक वही किया है?”

सभा में हलचल। कुछ स्त्रियाँ सिर हिलाती हैं।


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दृश्य 3 – देवी की परिभाषा पर बहस

अमाया (दृढ़ स्वर में):
“ऋषभ, देवी प्रतिमा हैं, प्रतीक हैं।
मैं जीवित स्त्री हूँ —
खेती करती हूँ,
निर्णय करती हूँ,
अन्याय का विरोध करती हूँ।
क्या तुम जीवित को प्रतिमा बना दोगे?”

भैरव:
“देवी की परिभाषा यही है कि वह मौन रहकर दिशा देती है।
उनकी आँखें बोलती हैं, पर वह विवादों में नहीं उतरतीं।
अमाया, तुम्हें अब मानव झगड़ों से ऊपर उठना चाहिए।”

अमाया (कटु स्वर में):
“ऊपर उठना या बाहर करना?”

सभा में सन्नाटा छा जाता है।

अर्जन:
“परिषद झगड़ों से भरी है।
कभी खेत बाँटने का विवाद,
कभी पशु पर दावा।
क्या अमाया जैसी शक्ति इन छोटे विवादों में बैठे?
उनका स्थान ऊँचा होना चाहिए।”


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दृश्य 4 – पुरुषों का महिमा मंडन

ऋषभ (गंभीर और ऊँचे स्वर में):
“सोचो — जब अमाया देवी होंगी,
उनकी मूर्ति यहाँ खड़ी होगी,
तो युगों तक दीप जलेंगे।
परिषद के निर्णय भुला दिए जाएँगे,
पर देवी अमाया का नाम अमर रहेगा।

देवी शाश्वत हैं, परिषद नश्वर।
क्या अमाया जैसी शक्ति को नश्वर परिषद में बाँधना उचित है?”

भैरव:
“और जब हम वंश और गोत्र के नियम गढ़ेंगे,
तो लोग पूछेंगे — किसकी आज्ञा से?
हम कहेंगे — देवी अमाया के आशीर्वाद से।
फिर कोई विद्रोह नहीं करेगा।”

अर्जन (कुटिल हँसी के साथ):
“देवी का नाम हमारी ढाल होगा।
कोई स्त्री या पुरुष निर्णयों पर प्रश्न नहीं कर पाएगा।
क्योंकि वे कहेंगे — देवी की छाया हमारे साथ है।”


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दृश्य 5 – स्त्रियों की प्रतिक्रियाएँ

रीवा (युवा):
“वाह! अमाया जीवित देवी कहलाएँगी।
यह तो सबसे बड़ा गौरव है।
हमारे बीच देवी होंगी।”

निराया (वृद्धा, क्रोध से):
“गौरव? यह कैद है।
देवी की पूजा होती है,
पर उसकी वाणी सभा तक नहीं पहुँचती।
आज अमाया देवी बनीं,
तो कल कोई भी स्त्री परिषद में नहीं बैठेगी।”


सभा दो हिस्सों में बँट जाती है।
कुछ स्त्रियाँ गीत गाने लगती हैं, कुछ गुस्से से काँपती हैं।


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उप-दृश्य 1 – पुरुषों की गुप्त हँसी

सभा स्थगित हो चुकी है। बाहर निकलते हुए पुरुष आपस में धीमे स्वर में हँसते हैं।

भैरव (फुसफुसाकर):
“देखा ऋषभ, कैसे स्त्रियाँ स्वयं हमारे जाल में फँस गईं।
देवी का नाम सुनते ही आधी तो भावुक होकर हमारी ओर आ गईं।”

अर्जन:
“हाँ। निराया जैसी वृद्धाएँ चाहे कितना भी विरोध करें,
युवा पीढ़ी तो हमारे साथ है।
देवी का शब्द उनके दिलों को मोह लेता है।”

ऋषभ (गंभीर मुस्कान के साथ):
“यही राजनीति है —
सम्मान की आड़ में अधिकार छीनना।”


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उप-दृश्य 2 – अमाया और निराया का निजी संवाद

सभा के बाद अमाया अकेली बैठी है। निराया पास आती है।

निराया:
“तुमने क्यों स्वीकार कर लिया, अमाया?
तुम्हें देवी बना कर वे तुम्हें मौन कर देंगे।”

अमाया (धीरे स्वर में):
“निराया, मैंने हारकर स्वीकार नहीं किया।
मैंने समय को बीज देकर छोड़ा है।
वे सोचते हैं कि प्रतिमा मौन है,
पर मैं जानती हूँ — मौन भी गूँज बनता है।
एक दिन कोई स्त्री मेरी आँखों में देखेगी
और फिर आवाज़ उठाएगी।”


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उप-दृश्य 3 – युवा स्त्रियों का उल्लास

सभा स्थल के बाहर युवा स्त्रियाँ गीत गा रही हैं।

रीवा (उत्साहित होकर):
“अब हमारी अमाया देवी कहलाएँगी!
कितना गर्व होगा कि हम देवी की संततियाँ हैं।”

दूसरी युवती:
“हाँ, अब हमें कोई चोट नहीं पहुँचा पाएगा।
हमारी देवी हमारे साथ हैं।”

उनकी आँखों में सच्चा गर्व है,
पर भीतर यह मासूम उल्लास पुरुषों के षड्यंत्र को ही मजबूत कर रहा है।


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उप-दृश्य 4 – ऋषभ और अमाया का आमना-सामना

सभा के बाद ऋषभ अमाया के पास आता है।

ऋषभ (कुटिल मुस्कान के साथ):
“अमाया, तुमने जो निर्णय लिया,
वह सभ्यता को नई दिशा देगा।
अब तुम मानव निर्णयों से ऊपर हो।”

अमाया (आँखों में आग भरकर):
“ऋषभ, तुमने मुझे ऊपर नहीं उठाया,
तुमने मुझे मौन किया है।
पर याद रखो — देवी के मौन में भी तूफ़ान पलता है।
और वह तूफ़ान एक दिन तुम्हें भी बहा ले जाएगा।”

ऋषभ चुप हो जाता है, पर उसके चेहरे पर संतोष की छाया है।

अध्याय 0D – देवी का षड्यंत्र


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दृश्य 1 – गुप्त आग के चारों ओर

रात गहरी है। गाँव के बाहर नदी किनारे पुरुषों का एक दल अग्नि के चारों ओर बैठा है।
आग की लपटें चेहरों पर पड़ रही हैं। हवा में तनाव और फुसफुसाहट है।

ऋषभ (धीरे-धीरे):
“अमाया को सीधे हटाना असंभव है।
वह स्त्रियों की आत्मा है।
कोई भी स्त्री उसके विरुद्ध नहीं जाएगी।
पर यदि वह परिषद में रही तो पुरुषों की आवाज़ कभी नहीं सुनी जाएगी।
हमें रास्ता ढूँढना होगा।”

भैरव:
“पर परिषद से उसे बाहर कैसे करें?
यदि हम जबरन हटाएँगे तो बगावत होगी।”

ऋषभ (आँखों में चमक):
“बाहर नहीं करेंगे, ऊपर उठाएँगे।
उसे देवी बना देंगे।
देवी की पूजा होगी, पर निर्णय नहीं।
वह प्रतिमा होगी, हम नियम बनाएँगे।
स्त्रियाँ सोचेंगी कि उनकी अमाया सबसे ऊँचे स्थान पर है।”

पुरुषों के चेहरों पर धीरे-धीरे सहमति उभरती है।
यह षड्यंत्र ठोस रूप लेने लगता है।


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दृश्य 2 – परिषद का आरंभ

अगली सुबह।
मध्य में मातृदेवी की प्राचीन मूर्ति, चारों ओर दीपक टिमटिमा रहे हैं।
स्त्रियाँ वृत्त में बैठी हैं, पुरुष आदर से किनारे खड़े।

ऋषभ आगे बढ़ता है, हाथ जोड़कर मूर्ति के सामने झुकता है।

ऋषभ:
“मातृदेवी हमारी सभ्यता की आत्मा हैं।
धरती की तरह वह सबको धारण करती हैं,
जल की तरह प्यास बुझाती हैं,
अग्नि की तरह अंधकार को हराती हैं।
देवी नियम नहीं बनातीं,
देवी केवल आशीर्वाद देती हैं।

और क्या यह सत्य नहीं कि अमाया ने अब तक वही किया है?”

सभा में हलचल। कुछ स्त्रियाँ सिर हिलाती हैं।


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दृश्य 3 – देवी की परिभाषा पर बहस

अमाया (दृढ़ स्वर में):
“ऋषभ, देवी प्रतिमा हैं, प्रतीक हैं।
मैं जीवित स्त्री हूँ —
खेती करती हूँ,
निर्णय करती हूँ,
अन्याय का विरोध करती हूँ।
क्या तुम जीवित को प्रतिमा बना दोगे?”

भैरव:
“देवी की परिभाषा यही है कि वह मौन रहकर दिशा देती है।
उनकी आँखें बोलती हैं, पर वह विवादों में नहीं उतरतीं।
अमाया, तुम्हें अब मानव झगड़ों से ऊपर उठना चाहिए।”

अमाया (कटु स्वर में):
“ऊपर उठना या बाहर करना?”

सभा में सन्नाटा छा जाता है।

अर्जन:
“परिषद झगड़ों से भरी है।
कभी खेत बाँटने का विवाद,
कभी पशु पर दावा।
क्या अमाया जैसी शक्ति इन छोटे विवादों में बैठे?
उनका स्थान ऊँचा होना चाहिए।”


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दृश्य 4 – पुरुषों का महिमा मंडन

ऋषभ (गंभीर और ऊँचे स्वर में):
“सोचो — जब अमाया देवी होंगी,
उनकी मूर्ति यहाँ खड़ी होगी,
तो युगों तक दीप जलेंगे।
परिषद के निर्णय भुला दिए जाएँगे,
पर देवी अमाया का नाम अमर रहेगा।

देवी शाश्वत हैं, परिषद नश्वर।
क्या अमाया जैसी शक्ति को नश्वर परिषद में बाँधना उचित है?”

भैरव:
“और जब हम वंश और गोत्र के नियम गढ़ेंगे,
तो लोग पूछेंगे — किसकी आज्ञा से?
हम कहेंगे — देवी अमाया के आशीर्वाद से।
फिर कोई विद्रोह नहीं करेगा।”

अर्जन (कुटिल हँसी के साथ):
“देवी का नाम हमारी ढाल होगा।
कोई स्त्री या पुरुष निर्णयों पर प्रश्न नहीं कर पाएगा।
क्योंकि वे कहेंगे — देवी की छाया हमारे साथ है।”


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दृश्य 5 – स्त्रियों की प्रतिक्रियाएँ

रीवा (युवा):
“वाह! अमाया जीवित देवी कहलाएँगी।
यह तो सबसे बड़ा गौरव है।
हमारे बीच देवी होंगी।”

निराया (वृद्धा, क्रोध से):
“गौरव? यह कैद है।
देवी की पूजा होती है,
पर उसकी वाणी सभा तक नहीं पहुँचती।
आज अमाया देवी बनीं,
तो कल कोई भी स्त्री परिषद में नहीं बैठेगी।”


सभा दो हिस्सों में बँट जाती है।
कुछ स्त्रियाँ गीत गाने लगती हैं, कुछ गुस्से से काँपती हैं।


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उप-दृश्य 1 – पुरुषों की गुप्त हँसी

सभा स्थगित हो चुकी है। बाहर निकलते हुए पुरुष आपस में धीमे स्वर में हँसते हैं।

भैरव (फुसफुसाकर):
“देखा ऋषभ, कैसे स्त्रियाँ स्वयं हमारे जाल में फँस गईं।
देवी का नाम सुनते ही आधी तो भावुक होकर हमारी ओर आ गईं।”

अर्जन:
“हाँ। निराया जैसी वृद्धाएँ चाहे कितना भी विरोध करें,
युवा पीढ़ी तो हमारे साथ है।
देवी का शब्द उनके दिलों को मोह लेता है।”

ऋषभ (गंभीर मुस्कान के साथ):
“यही राजनीति है —
सम्मान की आड़ में अधिकार छीनना।”


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उप-दृश्य 2 – अमाया और निराया का निजी संवाद

सभा के बाद अमाया अकेली बैठी है। निराया पास आती है।

निराया:
“तुमने क्यों स्वीकार कर लिया, अमाया?
तुम्हें देवी बना कर वे तुम्हें मौन कर देंगे।”

अमाया (धीरे स्वर में):
“निराया, मैंने हारकर स्वीकार नहीं किया।
मैंने समय को बीज देकर छोड़ा है।
वे सोचते हैं कि प्रतिमा मौन है,
पर मैं जानती हूँ — मौन भी गूँज बनता है।
एक दिन कोई स्त्री मेरी आँखों में देखेगी
और फिर आवाज़ उठाएगी।”


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उप-दृश्य 3 – युवा स्त्रियों का उल्लास

सभा स्थल के बाहर युवा स्त्रियाँ गीत गा रही हैं।

रीवा (उत्साहित होकर):
“अब हमारी अमाया देवी कहलाएँगी!
कितना गर्व होगा कि हम देवी की संततियाँ हैं।”

दूसरी युवती:
“हाँ, अब हमें कोई चोट नहीं पहुँचा पाएगा।
हमारी देवी हमारे साथ हैं।”

उनकी आँखों में सच्चा गर्व है,
पर भीतर यह मासूम उल्लास पुरुषों के षड्यंत्र को ही मजबूत कर रहा है।


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उप-दृश्य 4 – ऋषभ और अमाया का आमना-सामना

सभा के बाद ऋषभ अमाया के पास आता है।

ऋषभ (कुटिल मुस्कान के साथ):
“अमाया, तुमने जो निर्णय लिया,
वह सभ्यता को नई दिशा देगा।
अब तुम मानव निर्णयों से ऊपर हो।”

अमाया (आँखों में आग भरकर):
“ऋषभ, तुमने मुझे ऊपर नहीं उठाया,
तुमने मुझे मौन किया है।
पर याद रखो — देवी के मौन में भी तूफ़ान पलता है।
और वह तूफ़ान एक दिन तुम्हें भी बहा ले जाएगा।”

ऋषभ चुप हो जाता है, पर उसके चेहरे पर संतोष की छाया है।

अध्याय 0D – देवी का षड्यंत्र


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दृश्य 1 – गुप्त आग के चारों ओर

रात गहरी है। गाँव के बाहर नदी किनारे पुरुषों का एक दल अग्नि के चारों ओर बैठा है।
आग की लपटें चेहरों पर पड़ रही हैं। हवा में तनाव और फुसफुसाहट है।

ऋषभ (धीरे-धीरे):
“अमाया को सीधे हटाना असंभव है।
वह स्त्रियों की आत्मा है।
कोई भी स्त्री उसके विरुद्ध नहीं जाएगी।
पर यदि वह परिषद में रही तो पुरुषों की आवाज़ कभी नहीं सुनी जाएगी।
हमें रास्ता ढूँढना होगा।”

भैरव:
“पर परिषद से उसे बाहर कैसे करें?
यदि हम जबरन हटाएँगे तो बगावत होगी।”

ऋषभ (आँखों में चमक):
“बाहर नहीं करेंगे, ऊपर उठाएँगे।
उसे देवी बना देंगे।
देवी की पूजा होगी, पर निर्णय नहीं।
वह प्रतिमा होगी, हम नियम बनाएँगे।
स्त्रियाँ सोचेंगी कि उनकी अमाया सबसे ऊँचे स्थान पर है।”

पुरुषों के चेहरों पर धीरे-धीरे सहमति उभरती है।
यह षड्यंत्र ठोस रूप लेने लगता है।


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दृश्य 2 – परिषद का आरंभ

अगली सुबह।
मध्य में मातृदेवी की प्राचीन मूर्ति, चारों ओर दीपक टिमटिमा रहे हैं।
स्त्रियाँ वृत्त में बैठी हैं, पुरुष आदर से किनारे खड़े।

ऋषभ आगे बढ़ता है, हाथ जोड़कर मूर्ति के सामने झुकता है।

ऋषभ:
“मातृदेवी हमारी सभ्यता की आत्मा हैं।
धरती की तरह वह सबको धारण करती हैं,
जल की तरह प्यास बुझाती हैं,
अग्नि की तरह अंधकार को हराती हैं।
देवी नियम नहीं बनातीं,
देवी केवल आशीर्वाद देती हैं।

और क्या यह सत्य नहीं कि अमाया ने अब तक वही किया है?”

सभा में हलचल। कुछ स्त्रियाँ सिर हिलाती हैं।


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दृश्य 3 – देवी की परिभाषा पर बहस

अमाया (दृढ़ स्वर में):
“ऋषभ, देवी प्रतिमा हैं, प्रतीक हैं।
मैं जीवित स्त्री हूँ —
खेती करती हूँ,
निर्णय करती हूँ,
अन्याय का विरोध करती हूँ।
क्या तुम जीवित को प्रतिमा बना दोगे?”

भैरव:
“देवी की परिभाषा यही है कि वह मौन रहकर दिशा देती है।
उनकी आँखें बोलती हैं, पर वह विवादों में नहीं उतरतीं।
अमाया, तुम्हें अब मानव झगड़ों से ऊपर उठना चाहिए।”

अमाया (कटु स्वर में):
“ऊपर उठना या बाहर करना?”

सभा में सन्नाटा छा जाता है।

अर्जन:
“परिषद झगड़ों से भरी है।
कभी खेत बाँटने का विवाद,
कभी पशु पर दावा।
क्या अमाया जैसी शक्ति इन छोटे विवादों में बैठे?
उनका स्थान ऊँचा होना चाहिए।”


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दृश्य 4 – पुरुषों का महिमा मंडन

ऋषभ (गंभीर और ऊँचे स्वर में):
“सोचो — जब अमाया देवी होंगी,
उनकी मूर्ति यहाँ खड़ी होगी,
तो युगों तक दीप जलेंगे।
परिषद के निर्णय भुला दिए जाएँगे,
पर देवी अमाया का नाम अमर रहेगा।

देवी शाश्वत हैं, परिषद नश्वर।
क्या अमाया जैसी शक्ति को नश्वर परिषद में बाँधना उचित है?”

भैरव:
“और जब हम वंश और गोत्र के नियम गढ़ेंगे,
तो लोग पूछेंगे — किसकी आज्ञा से?
हम कहेंगे — देवी अमाया के आशीर्वाद से।
फिर कोई विद्रोह नहीं करेगा।”

अर्जन (कुटिल हँसी के साथ):
“देवी का नाम हमारी ढाल होगा।
कोई स्त्री या पुरुष निर्णयों पर प्रश्न नहीं कर पाएगा।
क्योंकि वे कहेंगे — देवी की छाया हमारे साथ है।”


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दृश्य 5 – स्त्रियों की प्रतिक्रियाएँ

रीवा (युवा):
“वाह! अमाया जीवित देवी कहलाएँगी।
यह तो सबसे बड़ा गौरव है।
हमारे बीच देवी होंगी।”

निराया (वृद्धा, क्रोध से):
“गौरव? यह कैद है।
देवी की पूजा होती है,
पर उसकी वाणी सभा तक नहीं पहुँचती।
आज अमाया देवी बनीं,
तो कल कोई भी स्त्री परिषद में नहीं बैठेगी।”


सभा दो हिस्सों में बँट जाती है।
कुछ स्त्रियाँ गीत गाने लगती हैं, कुछ गुस्से से काँपती हैं।


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उप-दृश्य 1 – पुरुषों की गुप्त हँसी

सभा स्थगित हो चुकी है। बाहर निकलते हुए पुरुष आपस में धीमे स्वर में हँसते हैं।

भैरव (फुसफुसाकर):
“देखा ऋषभ, कैसे स्त्रियाँ स्वयं हमारे जाल में फँस गईं।
देवी का नाम सुनते ही आधी तो भावुक होकर हमारी ओर आ गईं।”

अर्जन:
“हाँ। निराया जैसी वृद्धाएँ चाहे कितना भी विरोध करें,
युवा पीढ़ी तो हमारे साथ है।
देवी का शब्द उनके दिलों को मोह लेता है।”

ऋषभ (गंभीर मुस्कान के साथ):
“यही राजनीति है —
सम्मान की आड़ में अधिकार छीनना।”


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उप-दृश्य 2 – अमाया और निराया का निजी संवाद

सभा के बाद अमाया अकेली बैठी है। निराया पास आती है।

निराया:
“तुमने क्यों स्वीकार कर लिया, अमाया?
तुम्हें देवी बना कर वे तुम्हें मौन कर देंगे।”

अमाया (धीरे स्वर में):
“निराया, मैंने हारकर स्वीकार नहीं किया।
मैंने समय को बीज देकर छोड़ा है।
वे सोचते हैं कि प्रतिमा मौन है,
पर मैं जानती हूँ — मौन भी गूँज बनता है।
एक दिन कोई स्त्री मेरी आँखों में देखेगी
और फिर आवाज़ उठाएगी।”


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उप-दृश्य 3 – युवा स्त्रियों का उल्लास

सभा स्थल के बाहर युवा स्त्रियाँ गीत गा रही हैं।

रीवा (उत्साहित होकर):
“अब हमारी अमाया देवी कहलाएँगी!
कितना गर्व होगा कि हम देवी की संततियाँ हैं।”

दूसरी युवती:
“हाँ, अब हमें कोई चोट नहीं पहुँचा पाएगा।
हमारी देवी हमारे साथ हैं।”

उनकी आँखों में सच्चा गर्व है,
पर भीतर यह मासूम उल्लास पुरुषों के षड्यंत्र को ही मजबूत कर रहा है।


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उप-दृश्य 4 – ऋषभ और अमाया का आमना-सामना

सभा के बाद ऋषभ अमाया के पास आता है।

ऋषभ (कुटिल मुस्कान के साथ):
“अमाया, तुमने जो निर्णय लिया,
वह सभ्यता को नई दिशा देगा।
अब तुम मानव निर्णयों से ऊपर हो।”

अमाया (आँखों में आग भरकर):
“ऋषभ, तुमने मुझे ऊपर नहीं उठाया,
तुमने मुझे मौन किया है।
पर याद रखो — देवी के मौन में भी तूफ़ान पलता है।
और वह तूफ़ान एक दिन तुम्हें भी बहा ले जाएगा।”

ऋषभ चुप हो जाता है, पर उसके चेहरे पर संतोष की छाया है।


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उप-दृश्य 5 – भविष्य का संकेत

आसमान में अचानक बादल गरजते हैं।
दीपक की लौ काँपती है।
सभा में लौटकर बैठी अमाया मूर्ति की ओर देखती है।

अमाया (स्वगत):
“आज उन्होंने मुझे देवी बनाया,
कल यह समाज पितृसत्ता के बंधन में जकड़ा जाएगा।
पर समय बदलता है।
बीज को दबाओ, फिर भी वह मिट्टी फाड़कर अंकुर बनता है।
मेरा मौन ही आने वाले युगों का उद्घोष बनेगा।”

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उप-दृश्य 5 – भविष्य का संकेत

आसमान में अचानक बादल गरजते हैं।
दीपक की लौ काँपती है।
सभा में लौटकर बैठी अमाया मूर्ति की ओर देखती है।

अमाया (स्वगत):
“आज उन्होंने मुझे देवी बनाया,
कल यह समाज पितृसत्ता के बंधन में जकड़ा जाएगा।
पर समय बदलता है।
बीज को दबाओ, फिर भी वह मिट्टी फाड़कर अंकुर बनता है।
मेरा मौन ही आने वाले युगों का उद्घोष बनेगा।”

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उप-दृश्य 5 – भविष्य का संकेत

आसमान में अचानक बादल गरजते हैं।
दीपक की लौ काँपती है।
सभा में लौटकर बैठी अमाया मूर्ति की ओर देखती है।

अमाया (स्वगत):
“आज उन्होंने मुझे देवी बनाया,
कल यह समाज पितृसत्ता के बंधन में जकड़ा जाएगा।
पर समय बदलता है।
बीज को दबाओ, फिर भी वह मिट्टी फाड़कर अंकुर बनता है।
मेरा मौन ही आने वाले युगों का उद्घोष बनेगा।”

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