Monday, May 3, 2021

माँ

ये शब्द नही
ये गीत नही
कोई धर्म रीति का ज्ञान नही
ये उस बालक के प्रश्न हैं
जिसके जीवन का कोई मान नही
मां क्यो रहती है तू सड़को पर
क्या तुझे किसी का डर नही
या तू भी है उस कोयल जैसी
जिसका अपना कोई घर नही।

Saturday, May 1, 2021

सुनो गौर से

 सुनो गौर से वसुंधरा के 

हृदय पीर की करुण कहानी 

सारी सृष्टि विलख रही है 

क्यों की तुमने ये मनमानी। 


वसुंधरा की पुकार


सुनो गौर से —

वसुंधरा के

हृदय-पीर की

करुण कहानी।


वो जो झेलती रही

तुम्हारी लालसा,

तुम्हारी खोखली जीतों की दौड़,

तुम्हारे विकास की सड़ती परिभाषाएँ।


सारी सृष्टि

विलख रही है —

नदियाँ सूख चुकी हैं,

पर्वत लहूलुहान हैं,

हवा में घुटन है,

और

पक्षी अब गीत नहीं,

सिसकियाँ गाते हैं।


क्यों?

क्योंकि तुमने की मनमानी —

पेड़ काटे

जैसे वो तुम्हारे दुश्मन हों,

ज़मीन खोदी

जैसे वहाँ कोई आत्मा ही न हो,

नदियों में ज़हर घोला

और फिर

अपने ही चेहरे से नज़रें चुरा लीं।


धरती माँ अब थकी है।

वो करवट बदल रही है —

भूचालों में,

तूफ़ानों में,

गर्मी की लपटों में।


ये चेतावनी है,

आख़िरी नहीं —

पर

अनसुनी की गई

तो शायद आख़िरी बन जाए।


अब भी वक़्त है।

लौटो —

वापस प्रकृति की ओर।

सीखो फिर से

देना, सहेजना, संभालना।


वरना

एक दिन

धरती चुप नहीं रहेगी —

और तुम

कुछ भी कहने लायक नहीं बचोगे।

बदल रहा है मेरा भारत

बदल रहा है मेरा भारत 

मेरा भारत बदल रहा है। 

युगों युगों से जमा हुआ था 

आज हिमालय पिघल रहा है। 


बदल रहा है मेरा भारत


बदल रहा है

मेरा भारत,

मेरा भारत

बदल रहा है।


फ्लाईओवरों के नीचे

भूख अब भी बैठी है,

पर ऊपर

सपनों की गाड़ियाँ दौड़ रही हैं।


स्मार्ट सिटी बन रहे हैं —

पर गाँव अब भी

पानी को तरसते हैं।


डिजिटल हो गया है देश —

पर कुछ उंगलियाँ

अब भी पढ़ना नहीं जानतीं।


युगों-युगों से

थमे हुए बादल

अब बरसने लगे हैं,

पर कुछ सूखे खेत

अब भी इंतज़ार में हैं।


और हाँ —

हिमालय भी पिघल रहा है।

शांति की तरह,

सहनशीलता की तरह,

प्रकृति की तरह।


कंक्रीट के नीचे

दबी है कोई नदी,

जो कभी गाती थी,

अब कराहती है।


बदलाव बुरा नहीं है —

पर क्या हमने

संवेदनाओं को भी

अपग्रेड कर लिया है?


कहने को

हम आगे बढ़ रहे हैं,

पर भीतर

कुछ पीछे छूटता जा रहा है।


मेरा भारत बदल रहा है —

हाँ,

पर सवाल ये है:

किधर?

राम नाम

राम नाम बस नाम नही है 

मानव की मर्यादा है 

मानव से ईश्वर होने की 

निर्मल पावन गाथा है। 


प्रिये तुम्हारे जाने से

टूट गया मन का इकतारा 

प्रिये तुम्हारे जाने से 

गाता हूँ पर दिल नही भरता 

गीत तुम्हारे गाने से। 

ऐ मेरे मुल्क के लोगों

 ऐ मेरे मुल्क के लोगों ये स्वीकार करो 

मुश्किलों से मिली आज़ादी ऐतबार करो 

ऐतबार करो तुम जरा विचार करो 

वीर बलिदानों की विरासत पे न प्रहार करो।