Saturday, May 1, 2021

सुनो गौर से

 सुनो गौर से वसुंधरा के 

हृदय पीर की करुण कहानी 

सारी सृष्टि विलख रही है 

क्यों की तुमने ये मनमानी। 


वसुंधरा की पुकार


सुनो गौर से —

वसुंधरा के

हृदय-पीर की

करुण कहानी।


वो जो झेलती रही

तुम्हारी लालसा,

तुम्हारी खोखली जीतों की दौड़,

तुम्हारे विकास की सड़ती परिभाषाएँ।


सारी सृष्टि

विलख रही है —

नदियाँ सूख चुकी हैं,

पर्वत लहूलुहान हैं,

हवा में घुटन है,

और

पक्षी अब गीत नहीं,

सिसकियाँ गाते हैं।


क्यों?

क्योंकि तुमने की मनमानी —

पेड़ काटे

जैसे वो तुम्हारे दुश्मन हों,

ज़मीन खोदी

जैसे वहाँ कोई आत्मा ही न हो,

नदियों में ज़हर घोला

और फिर

अपने ही चेहरे से नज़रें चुरा लीं।


धरती माँ अब थकी है।

वो करवट बदल रही है —

भूचालों में,

तूफ़ानों में,

गर्मी की लपटों में।


ये चेतावनी है,

आख़िरी नहीं —

पर

अनसुनी की गई

तो शायद आख़िरी बन जाए।


अब भी वक़्त है।

लौटो —

वापस प्रकृति की ओर।

सीखो फिर से

देना, सहेजना, संभालना।


वरना

एक दिन

धरती चुप नहीं रहेगी —

और तुम

कुछ भी कहने लायक नहीं बचोगे।

No comments:

Post a Comment