सुनो गौर से वसुंधरा के
हृदय पीर की करुण कहानी
सारी सृष्टि विलख रही है
क्यों की तुमने ये मनमानी।
वसुंधरा की पुकार
सुनो गौर से —
वसुंधरा के
हृदय-पीर की
करुण कहानी।
वो जो झेलती रही
तुम्हारी लालसा,
तुम्हारी खोखली जीतों की दौड़,
तुम्हारे विकास की सड़ती परिभाषाएँ।
सारी सृष्टि
विलख रही है —
नदियाँ सूख चुकी हैं,
पर्वत लहूलुहान हैं,
हवा में घुटन है,
और
पक्षी अब गीत नहीं,
सिसकियाँ गाते हैं।
क्यों?
क्योंकि तुमने की मनमानी —
पेड़ काटे
जैसे वो तुम्हारे दुश्मन हों,
ज़मीन खोदी
जैसे वहाँ कोई आत्मा ही न हो,
नदियों में ज़हर घोला
और फिर
अपने ही चेहरे से नज़रें चुरा लीं।
धरती माँ अब थकी है।
वो करवट बदल रही है —
भूचालों में,
तूफ़ानों में,
गर्मी की लपटों में।
ये चेतावनी है,
आख़िरी नहीं —
पर
अनसुनी की गई
तो शायद आख़िरी बन जाए।
अब भी वक़्त है।
लौटो —
वापस प्रकृति की ओर।
सीखो फिर से
देना, सहेजना, संभालना।
वरना
एक दिन
धरती चुप नहीं रहेगी —
और तुम
कुछ भी कहने लायक नहीं बचोगे।
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