Sunday, February 25, 2024

क्यों गोरा दिखा रहा है

नज़्म: "जैसा हूँ, वही रहूँ"

मेरी तस्वीर को
तू क्यों इतना सजा रहा है?
काला है तन —
इसे क्यों गोरा दिखा रहा है?

ये जो रंग है,
ये कोई दाग नहीं,
ये तो मेरी धरती की महक है,
मेरी माँ के आँचल की तपिश,
मेरे संघर्ष की छाया है।
तू क्यों इस पर उजाले का
झूठा परदा डाल रहा है?

मैं जो हूँ —
कभी धूप, कभी छाँव,
कभी मिट्टी में भीगा एक बीज,
कभी अंधेरे में टिमटिमाता दीया,
कभी टूटी आवाज़ में
एक पूरी दुनिया का गीत हूँ।

तू क्यों
मुझे सफ़ेद चमक का गुलाम बना रहा है?

मेरी हथेलियों की दरारों में
मज़दूरी की थकान है,
मेरे होठों की सख़्ती में
भूख का बयान है,
मेरी पीठ पर पड़े निशान
कोई कलंक नहीं,
बल्कि वक़्त के हथौड़ों से
ढला हुआ इतिहास हैं।

मैं जैसा हूँ —
उसी में मेरा गर्व है,
उसी में मेरा सत्य है,
उसी में मेरी शान है।

तू क्यों
मुझे बदलकर
अपने जैसे साँचे में ढाल रहा है?

मैं नहीं चाहता
झूठी सुंदरता का सर्टिफ़िकेट,
ना ही तेरी तारीफ़ों का क़र्ज़।
मुझे बस ये हक़ चाहिए
कि मैं कह सकूँ —
"मैं हूँ… और यही मेरा होना है।"

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