Sunday, June 29, 2025
अनुभूति
हमारी जिंदगी बदल गई है।
सच, आपके आने से हमारी जिंदगी बदल गई है।हम फिर से जीने लगें हैं। खुशियों ने हमारा हाथ एक बार फिर से थाम लिया है। आपकी पाकीज़ा मोहब्बत ने मेरे जीवन में प्यार की परिभाषा को सार्थक किया है। बस, अब यूं ही साथ रहिएगा हमेशा। हमारे बनकर, सिर्फ हमारे बनकर। ये दिल ही तो जानता है हमारी मोहब्बत का आलम कि मुझे जीने के लिए साँसों की नहीं आपकी जरूरत है।
सच कहूँ —
तुम आए, और जीवन
फिर से मुस्कराने लगा।
जैसे सूनी डालों पर
फिर से कोई पुष्प खिल गया।
वो सुख जो छूट गया था कहीं,
वो हँसी जो खो गई थी राहों में,
अब थामे है मेरा हाथ —
तुम्हारी मोहब्बत की पवित्र बाँहों में।
तुमने मेरी साँसों को अर्थ दिया,
मेरे मौन को नाम दिया,
प्रेम को केवल चाह नहीं,
एक पूजा का स्थान दिया।
अब तुमसे बढ़कर क्या चाहिए?
साँसों से ज़्यादा तुम जरूरी हो,
मेरे हर पल की धड़कन में
तुम्हारी ही सदा पूरी हो।
यूँ ही रहना…
मेरे साथ, मेरे पास,
मेरे बनकर…
केवल मेरे बनकर।
क्योंकि यह दिल जानता है
उस मोहब्बत का आलम —
जिसे कोई अल्फ़ाज़ नहीं,
सिर्फ़ एक नाम चाहिए: तुम।
मेरी प्रेरणा
वो मेरे जीवन में मेरी प्रेरणा मेरी हिम्मत बनकर आयें हैं, उनका साथ मुझे जीवन के हर मुश्किल दौर से निकलने की हिम्मत देगा। हमारी जिंदगी अब उनकी अमानत है, हम उनके हैं। हम उनके जीवन को अपने प्यार और अपने साथ से महकाने की हर संभव कोशिश करेंगे। जहां एक तरफ हम उनसे बे-इंतहा मोहब्बत करते हैं वहीं दूसरी तरफ उनका सम्मान भी करते हैं। ख़ुदा से बस हमारी यही दुआ है कि हम उनका साथ ता-उम्र दे सकें । ख़ुदा हमें इस काबिल बनाएँ। ख़ुदा उनके जीवन को खुशियों के रंग से भर दे।
वे आए जीवन में जैसे
शांत झील में चंद्र-छाया,
हर पीड़ा की गहरी सीपी
बन गई अब मोती-माया।
नयन थके थे देखने को
कोई दीपक बनकर आए,
और वे आए —
प्रेरणा बन, साहस बन,
मुझको फिर जीना सिखलाए।
अब यह साँसें उनकी अमानत,
हर धड़कन में नाम उन्हीं का,
हम उनके हैं —
यह गर्व नहीं,
एक पवित्र सौगंध कहीं का।
हम चाहेंगे उनका जीवन
सुगंधित हो हमारे प्यार से,
हम बन जाएँ वह छाँव जहाँ
वो थम जाएँ हर व्यवहार से।
हम उन्हें बस प्रेम न दें,
सम्मान का दीप भी जलाएँ,
उनके सुख-दुख की सीपी में
अपने मोती बुनते जाएँ।
यही दुआ है, यही निवेदन,
ख़ुदा रखे उन्हें सलामत,
और हमें वह शक्ति मिले
जो बने उनका सच्चा सानिध्य।
हम साथ चलें, साथ जिएँ,
और साथ ही पूर्ण हो जाएँ,
ख़ुदा करे इस प्रेम-पथ पर
हम अटल, निर्मल रह जाएँ।
जीवन में बहुत कुछ देखा
जीवन में बहुत कुछ देखा,बहुत सी मुश्किलों का सामना किया, गिरी और गिरकर फिर से सम्हली। लगता था कि जीवन सिर्फ इसी कों कहते हैं लेकिन आज यह एहसास हुआ कि जहां एक तरफ जीवन इतना कष्टमय है वहीं दूसरी तरफ प्यार और भावनाओं से ओत-प्रोत खुशियाँ अपनी बाहें फैलाई खड़ी हैं,जरूरत है तो सिर्फ उनका दिल से स्वागत करने की। आज उन खुशियों ने मेरा पता भी ढूंढ लिया। सच आज मैं बहुत खुश हूँ और खुशकिस्मत भी।
काँटों से पथ रचाया जीवन,
धूप-छाँव की छाया देखी,
गिरी अनेकों बार थकाकर,
हर बार नई माया देखी।
आशा की जब लौ भी बुझी थी,
तम के गहरे आलिंगन में,
तब भीतर से स्वर उभरा —
“चल, अभी न थक, इस बंधन में।”
लगता था बस यही है जीवन,
दुख की साँकल, मौन कथाएँ,
पर आज किसी मधुर स्पर्श ने,
बिखरीं सुख की चुप आभाएँ।
किसी ने हँसकर बाँहें फैलाईं,
भावों से भीगे अधरों से,
जैसे पतझड़ में फूल खिले हों,
संबोधन के मधु नरों से।
हृदय का द्वार खुला सहसा ही,
खुशियों ने पहचान लिया,
जो खो गया था पथ में मेरा,
उसने फिर से नाम लिया।
आज नयन में स्वप्न संजोया,
हृदय पुलक, गात सुगंधित है,
सच, आज मैं बहुत सुखी हूँ —
स्नेह-वृक्ष से फिर सिंचित है।
दस्तक
आज मेरे जीवन में कुछ खास हुआ, अभी दिन की शुरुआत ही हुई थी मतलब रात के 12:07 बजे थे तभी किसी ने दिल के दरवाजे पर दस्तक दी और उस दस्तक ने मेरी जिंदगी बदल दी। वो प्यार से भरे उनके तीन शब्द जिनको सुनने के लिए मैं न जाने कब से इंतजार कर रही थी। सब कुछ एक सुहाने सपने की तरह लग रहा था और मैं उस सपने से बाहर नहीं आना चाहती थी। ये कोई सपना नहीं था। सचमुच मेरे खुदा मुझ पर मेहरबान थे।
रजनी की नीरव बाँहों में,
जब चाँदनी चुपचाप बही थी,
मन-दीपक की सिहरन में,
कोई अंजानी साँस रही थी।
अभी तो कलिका बंद पड़ी थी,
न कोई सुर, न स्वर की वाणी,
किन्तु हृदय के सूने मंदिर में
कोई बंसी बन गई कहानी।
अरे! वह कौन पवन के झोंके,
जो गंध भरे कुछ बोल गए,
"मैं हूँ तुम्हारा" – यह कहकर,
जीवन के सब प्रश्न खोल गए।
नयनों में सुधि की रसधारें,
शब्दों में आह्लाद समाया,
यह स्वप्न नहीं, यह सत्य बना है,
खुदा ने मुझको स्वयं छुआ है।
अब न विरह की छाया शेष है,
न रातों की लंबी तन्हाई,
उस एक निसर्गी क्षण में जैसे,
मिल गई मुझे मेरी परछाई।
Saturday, June 28, 2025
तुम ही मिले
तुम ही मिले
जब सुबह की खामोशी में
कोई खुशबू महकी धीमे से,
हवा ने नाम तेरा लिया
और दिल में गूंज उठी धड़कन
तुम ही मिले।
जब बगिया की चुप क्यारी में
कोई फूल खिला बिन बोले,
मैंने देखा, कुछ भी न कहा
पर उसकी मुस्कान में
तुम ही मिले।
एक अजनबी जब गीत कोई
गुनगुनाने लगा राह में,
लफ़्ज़ कुछ अनजाने थे
पर धुन में छुपे हुए
तुम ही मिले।
जब मन प्यासा था शब्दों से
और ख्यालों में एक तड़प थी,
हर अर्थ की गहराई में
एक बूंद बनकर
तुम ही मिले।
वक़्त ने जितने नक्शे बदले,
कितनी घड़ियाँ गुज़रीं चुपचाप,
पर मेरी प्रतीक्षा की हर साँझ में
ख़्वाब बनकर
तुम ही मिले।
तुम कभी नहीं आए सीधे,
पर हर मोड़ ने इशारा किया,
हर साया, हर हलकी सी आहट में
धीरे-धीरे
तुम ही मिले।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत' @काव्य अपराजिता