तुम ही मिले
जब सुबह की खामोशी में
कोई खुशबू महकी धीमे से,
हवा ने नाम तेरा लिया
और दिल में गूंज उठी धड़कन
तुम ही मिले।
जब बगिया की चुप क्यारी में
कोई फूल खिला बिन बोले,
मैंने देखा, कुछ भी न कहा
पर उसकी मुस्कान में
तुम ही मिले।
एक अजनबी जब गीत कोई
गुनगुनाने लगा राह में,
लफ़्ज़ कुछ अनजाने थे
पर धुन में छुपे हुए
तुम ही मिले।
जब मन प्यासा था शब्दों से
और ख्यालों में एक तड़प थी,
हर अर्थ की गहराई में
एक बूंद बनकर
तुम ही मिले।
वक़्त ने जितने नक्शे बदले,
कितनी घड़ियाँ गुज़रीं चुपचाप,
पर मेरी प्रतीक्षा की हर साँझ में
ख़्वाब बनकर
तुम ही मिले।
तुम कभी नहीं आए सीधे,
पर हर मोड़ ने इशारा किया,
हर साया, हर हलकी सी आहट में
धीरे-धीरे
तुम ही मिले।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत' @काव्य अपराजिता
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