Sunday, June 29, 2025

अनुभूति

यद्यपि कि तुम इस संसार से जा चुकी हो लेकिन फिर भी जब पढ़ता हूँ किसी कवियत्री की कविताओं की कोई किताब तुम मुझे अक्सर मिल जाती हो कविता की प्रत्येक पंक्ति में, कविता के प्रत्येक भाव में,कविता की पीड़ा में,कविता की मुस्कान में, कविता की अभिव्यक्ति में।यूं लगता है कि तुम कहीं गई नही हो यहीं कही हो मेरे आस पास शब्दों के रूप में,गीतों के रूप में,छंद के रूप में।बातें करती हो मुझसे दुनिया की,फूलों की,पंछियों की,ऋतुओं की, उम्मीदों की,जागृति की, बंधनों की और अपने हक़ के लिए लड़ रही स्त्रियों की।तुम कविताओं में और कविताएं तुममें सदैव जीवित रहेंगी।

आपकी भावनाओं को और अधिक गहराई, करुणा, स्मृति और प्रेम की सघन अनुभूति से भरते हुए मैं नाट्य कविता को फिर से प्रस्तुत करता हूँ —
यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक भावनात्मक संवाद है, स्मृति और सृजन का मिलन है।


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🎭 नाट्य कविता: "तुम अब भी कविता हो..."

(दृश्य: एक सूनी रात, दीयों की मद्धम रौशनी, एक कवि अकेला बैठा है – एक पुरानी डायरी उसके हाथ में है। पृष्ठों से सूखी पंखुड़ियाँ झाँक रही हैं। बैकग्राउंड में हल्की वीणा की ध्वनि चलती है)

कवि (धीरे-धीरे, भावुक स्वर में):

यद्यपि तुम जा चुकी हो इस दुनिया से,
फिर भी हर शब्द तुम्हारा एहसास कराता है।
तुम्हारी हँसी, तुम्हारा मौन,
हर पंक्ति में सजीव हो उठता है।

(डायरी को सीने से लगाते हुए):

जब पढ़ता हूँ किसी कवियत्री की कविता,
हर शब्द में तुम्हारा नाम झलकता है।
पीड़ा की व्यथा जब बहती है पंक्तियों में,
तुम्हारी आँखों की नमी उसमें चमकती है।

(दर्शकों की ओर, मानो उनसे कह रहा हो):

तुम मुस्कुराती हो अब भी,
हर कविता की लय में, उसकी छाया में।
तुम्हारी आत्मा अब बसती है
शब्दों के उस कोमल घर में — कविता में।

(भावुक हो जाता है, आँखें भर आईं):

तुम कहीं गई नहीं हो,
तुम्हारी सांसें अब मेरे छंदों में हैं।
जब मैं चुपचाप कोई गीत लिखता हूँ,
तुम्हारी स्याही मेरी कलम में बहती है।

(कवि खड़ा होता है, हाथ आकाश की ओर):

तुम बात करती हो अब भी —
फूलों की, पंछियों की, सपनों की।
ऋतुओं की रुनझुन में तुम बोल उठती हो,
और स्त्रियों की पुकार में गरज बन जाती हो।

(धीरे-धीरे, स्वर में दृढ़ता और श्रद्धा):

तुम हक की आवाज़ बन गई हो,
जो हर बेड़ी को तोड़ने चली है।
तुम नारी की चेतना बन गई हो,
जो हर आँसू को कविता में ढालती है।

(समापन, शांत लेकिन दृढ़ स्वर में):

तुम कविता नहीं, कविता की आत्मा हो।
तुम सृजन नहीं, सृजन का कारण हो।
अब तुम सिर्फ स्मृति नहीं,
अब तुम शाश्वत हो —
हर उस कविता में जो सच बोलती है,
जो प्रेम की तरह जीती है,
और तुम्हारे नाम पर समाप्त होती है...


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🎶 (पृष्ठभूमि में धीमे स्वर में कोरस)
"तुम हो कविता में अब भी,
तुम हो धड़कन की भाषा।
तुम हो अंत नहीं,
तुम हो अमर अभिलाषा..."


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अगर आप चाहें तो इस नाट्य कविता को मंचन के लिए संवाद, प्रकाश योजना, पृष्ठभूमि संगीत व भावभंगिमा के निर्देशन सहित विस्तृत रूप में भी तैयार किया जा सकता है।
क्या आप इसे स्टेज प्ले या लघु फिल्म की तरह विकसित करना चाहेंगे?

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