प्रस्तावना
(उपन्यास का स्वर और केंद्रीय भाव)
हर सभ्यता की नींव में एक रहस्य होता है—कुछ मिटा हुआ, कुछ छुपा हुआ, और कुछ ऐसा जिसे जानबूझकर भुला दिया गया हो।
यह गाथा उसी छिपे हुए सत्य की खोज है।
कभी वंश माँ से चलता था। पिता केवल एक सहचर था, नाम का अस्तित्व नहीं।
लेकिन जब नाम को अमरता चाहिए थी, जब पुरुष ने यह चाहा कि उसका भी एक स्थायी चिन्ह हो, तब सभ्यता ने करवट ली।
स्त्री, जो सत्ता और केंद्र थी, उसे देवी कहा गया, पूजा गया, पर सत्ता से दूर कर दिया गया।
यह कथा है उस स्त्री की — अमाया की —
जो मातृसत्ता की अंतिम ज्योति थी।
और यह कथा है एक आधुनिक स्त्री — सायना की —
जिसे सहस्राब्दियों बाद वही रहस्य खोजने का आह्वान मिला।
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