अध्याय 1 – दृश्य 4: अमाया का एकांत
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1. परिवेश का चित्रण
रात गहराई हुई थी।
सभा बिखर चुकी थी, लोग अपने घर लौट चुके थे।
नगर की गलियों में अब केवल मशालों की लौ और पहरेदारों के कदमों की आहट बची थी।
अमाया अपने कक्ष में अकेली थी।
दीवारों पर दीपक टिमटिमा रहे थे, और बाहर से आती हवा उन्हें काँपाती थी।
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2. जनता का शोर बनाम अमाया का मौन
बाहर गलियों से अब भी जयकार सुनाई दे रही थी—
“देवी अमाया की जय!”
कुछ लोग दीप जलाकर उसके घर के सामने रख गए थे।
लेकिन अंदर…
अमाया का कक्ष मौन था।
यह मौन बाहरी जयकार से कहीं अधिक भारी था।
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3. अमाया का आत्मसंवाद
वह बिस्तर पर नहीं बैठी, बल्कि मिट्टी के फर्श पर घुटनों को समेटे बैठी थी।
उसने हाथों में एक पुष्प लिया, जिसे किसी ने उसके चरणों में चढ़ाया था।
अमाया (धीरे-धीरे):
“यह फूल… श्रद्धा का प्रतीक है या मेरी बेड़ियों का?
जब तक मैं जननी थी, मुझसे प्रश्न पूछे जाते थे।
अब देवी बनाकर, मुझसे केवल वर माँगा जाएगा।
निर्णय माँगे नहीं जाएँगे।”
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4. स्मृतियों की पीड़ा
उसके मन में स्मृतियाँ कौंधीं—
वह समय, जब लोग उसके पास आकर कहते थे:
“अमाया, खेतों में इस बार कौन-सा बीज बोना चाहिए?”
वह क्षण, जब व्यापारी उसके पास सौदे की शर्तें लेकर आते थे और वह तय करती थी कि क्या न्यायसंगत है।
अब वही लोग दीपक लेकर पूजा करने आएँगे, पर कोई निर्णय पूछने नहीं।
अमाया (मन ही मन):
“यह पूजा… यह सम्मान नहीं, यह निर्वासन है।”
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5. देह और मन का द्वंद्व
उसकी आँखें छलक रही थीं, पर चेहरा दृढ़ था।
उसके हाथ काँप रहे थे, पर होंठों पर एक कठोर मुस्कान थी।
उसने अपने आँसुओं को पोंछते हुए कहा—
अमाया:
“वे सोचते हैं, देवी मौन रहती है।
पर मेरा मौन ही सबसे बड़ी आवाज़ बनेगा।”
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6. ऋषभ की स्मृति
उसने आँखें बंद कीं और उसके सामने ऋषभ का चेहरा उभर आया।
सभा में खड़ा वह मौन पुरुष, जिसकी आँखों में संतोष की चमक थी।
उसने दाँत भींचते हुए कहा—
अमाया:
“ऋषभ… तू मुझे प्रेम करता था।
पर प्रेम को भी तूने सत्ता की सीढ़ी बना लिया।
तू मुझे ऊँचा उठा कर, मेरे पैरों तले जमीन खींच लेना चाहता है।
तू भूल रहा है—
मुझे देवी बनाकर तू मुझे मिटा नहीं सकता।
इतिहास देवी से नहीं, जननी से बनता है।”
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7. दृश्य का समापनदीपक की लौ हिलने लगी।
एक तेज़ हवा आई और दीपक बुझ गया।
कक्ष अंधकार में डूब गया।
अमाया ने अंधेरे में अपनी आँखें ऊपर उठाईं और धीमे स्वर में कहा—
अमाया:
“अगर मुझे देवी बनाकर मौन कर दिया गया,
तो मैं देवी नहीं, इतिहास बनूँगी।
और इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता।”
बाहर से सिंधु नदी की गहरी गूँज सुनाई दी,
मानो वह स्वयं अमाया के इस संकल्प की साक्षी हो।
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