Thursday, August 28, 2025

अध्याय एक

अध्याय 1: सिंधु के तट पर एक स्त्री

दृश्य 1: मोहनजोदड़ो का पश्चिमी टीला, विशाल सभा।
सभास्थल भरा हुआ था। नगाड़ों की गूंज, धूप की महक, और नदी की ठंडी बयार एक साथ मिलकर एक अजीब-सा वातावरण रच रही थी।
मंच पर खड़ी थी — अमाया।

पुरोहित (ऊँची आवाज़ में):
“आज से अमाया केवल जननी नहीं, हमारी देवी है।
उसकी पूजा होगी, उसके नाम पर दीप जलेंगे, और उसके आशीर्वाद से ही सभ्यता चलेगी।”

सभा (एक स्वर में):
“देवी अमाया की जय! देवी अमाया की जय!”

अमाया (मन ही मन):
“देवी? पूजा?
यह सम्मान है… या मुझे सत्ता से दूर करने का बहाना?”


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दृश्य 2: अमाया का मौन और ऋषभ की खोज
लोग उसके चरणों में फूल डाल रहे थे। ढोल-नगाड़ों की आवाज़ गूँज रही थी।
लेकिन उसकी आँखें भीड़ के उस कोने को खोज रही थीं, जहाँ ऋषभ खड़ा था।

अमाया (धीरे):
“ऋषभ… तू ही इस यज्ञ का सूत्रधार है।
क्या तू मुझे सच में देवी बना रहा है… या सत्ता से अलग कर रहा है?”


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दृश्य 3: सभा के भीतर गुप्त वार्ता
अमाया को मंच से उतारते ही पुरोहित और पुरुष-सभा एक साथ झुककर बोले—

पुरुष-सभा प्रमुख:
“अब वंश पिता से तय होगा।
अब गोत्र बनेगा, कुल बनेगा, और नाम अमर होगा।”

ऋषभ:
“माँ से वंश चलना अब तक ठीक था।
पर नाम कहाँ जाता था?
पिता मिट जाता था, इतिहास से गायब हो जाता था।
यह अन्याय है। अब यह नहीं होगा।”

दूसरा पुरुष:
“तो क्या अमाया का विरोध नहीं होगा?”

ऋषभ (कठोर स्वर में):
“उसे देवी बना दो।
जिसे पूजा जाता है, वह निर्णय नहीं लेती।
श्रद्धा सबसे बड़ा बंधन है।”


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दृश्य 4: अमाया का आत्मसंवाद
उस रात, अमाया अकेली अपने कक्ष में बैठी थी। दीपक टिमटिमा रहा था।
बाहर से भीड़ की आवाज़ें आ रही थीं — “देवी अमाया की जय!”

अमाया (अपने आप से):
“यह कैसी जय है?
मेरी कोख से जन्म लेने वाले को अब मेरा नाम नहीं मिलेगा।
अब वंश पिता से चलेगा।
मुझे देवी कहकर चुप करा दिया गया।
क्या सचमुच यही मेरी नियति है?”

(उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं, लेकिन चेहरा दृढ़ हो जाता है।)


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दृश्य 5: नदी के किनारे, अमाया और ऋषभ आमने-सामने
अगले दिन सुबह। सिंधु नदी के किनारे ऋषभ और अमाया आमने-सामने खड़े हैं।

अमाया (कटु स्वर में):
“ऋषभ, क्या यही तेरा प्रेम है?
मुझे देवी बनाकर पूजा, पर सत्ता छीन ली।
तू चाहता क्या है?”

ऋषभ (शांत, पर कठोर):
“मैं चाहता हूँ अमरता।
मेरे पुत्र मेरे नाम से जाने जाएँ।
माँ तो दिखती है, पिता अदृश्य हो जाता है।
मैं अदृश्य नहीं रहना चाहता।”

अमाया:
“तू अदृश्य नहीं, सत्ता-लोलुप हो गया है।
तू चाहता है वंश पिता से चले,
पर भूल रहा है — जीवन तो माँ से ही आता है।”

ऋषभ:
“जीवन माँ से आता है,
पर इतिहास पिता से लिखा जाएगा।”

(दोनों की आँखों में आग है। सिंधु नदी मौन गवाह बनकर बह रही है।)


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दृश्य 6: अध्याय का समापन
रात को नगर की गलियों में चर्चा है।
लोग कहते हैं:
“अमाया देवी है… पर ऋषभ अब धर्म का रक्षक है।”

अमाया अपने कक्ष में बैठी है।
उसकी आँखें नदी की ओर हैं।
वह धीमे स्वर में कहती है—

अमाया:
“अगर मुझे देवी बनाकर सत्ता छीन ली गई,
तो मैं देवी नहीं, इतिहास बनूँगी।
और इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता।”

दीपक बुझ जाता है।
अंधेरे में केवल नदी की गूँज है।


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