अध्याय 2 – दृश्य 5: अमाया का प्रवेश और प्रतिरोध
1. सभा का वातावरण
ऋतुगण की सभा अपने निर्णायक क्षण में थी।
विवाह तय हो चुका था, गोत्र की नींव रख दी गई थी, और अभी-अभी यह भी घोषित हुआ था कि वंश पिता से चलेगा।
दीपकों की लौ तेज़ थी, पर मंडप के भीतर एक भारी सन्नाटा पसरा था — जैसे सबको एहसास हो कि वे इतिहास रच रहे हैं।
2. अचानक प्रवेश
तभी मंडप का पर्दा तेज़ी से हटा।
भीतर खलबली मच गई।
सभा के बीच से आवाज़ें उठीं —
“कौन?”
“यहाँ स्त्रियों का आना वर्जित है!”
लेकिन अगले ही पल सभी स्तब्ध रह गए।
वह थी — अमाया।
उसका चेहरा गम्भीर था, आँखों में अग्नि थी, और उसके कदम दृढ़ थे।
वह धीरे-धीरे सभा के बीचों-बीच आ खड़ी हुई।
3. अमाया का क्रोध
उसने चारों ओर देखा, फिर ऊँची आवाज़ में कहा:
अमाया (गर्जना में):
“यह कैसी सभा है जहाँ स्त्री का निर्णय ही नहीं?
मेरे शरीर, मेरी कोख, मेरी संतान पर तुम नियम बना रहे हो और मुझे देवी कहकर बाहर रख दिया गया?
क्या तुम्हें लगता है कि पूजा सम्मान है?
नहीं! यह सबसे बड़ा अपमान है।”
सभा मौन हो गई।
कुछ पुरुष नीचे देखने लगे, कुछ के चेहरों पर क्रोध था।
4. ऋषभ का उत्तर
ऋषभ खड़ा हुआ।
उसकी आवाज़ शांत थी, पर शब्द कठोर थे।
ऋषभ:
“अमाया, तू अब देवी है।
तेरा स्थान निर्णय में नहीं, आशीर्वाद में है।
देवी पर कोई प्रश्न नहीं उठाता।
उसकी पूजा होती है, उसके शब्द मंत्र बनते हैं।
और शासन? शासन पुरुष करते हैं।”
5. अमाया का प्रतिवाद
अमाया ने आगे बढ़कर कहा:
अमाया:
“अगर यह देवी होना है, तो मैं इसे ठुकराती हूँ।
मुझे पूजा नहीं, अधिकार चाहिए।
जननी को इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता।
तुम मुझे ऊँचा उठाकर चुप कराना चाहते हो,
पर याद रखो — मौन भी विद्रोह बन सकता है।”
उसकी आवाज़ में इतना दम था कि मंडप की दीवारें काँप उठीं।
सभा के कई सदस्य एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
6. तनाव और मौन
कुछ क्षणों के लिए सभा बिल्कुल मौन रही।
केवल दीपक की लौ काँप रही थी।
पुरुष यह नहीं समझ पा रहे थे कि अमाया के इस प्रतिरोध का उत्तर कैसे दें।
ऋषभ ने गहरी साँस ली और बोला:
ऋषभ:
“तेरी बातें जनता को विचलित करेंगी, अमाया।
पर नियम बन चुका है।
वंश पिता से ही चलेगा।”
7. दृश्य का समापन
अमाया ने उसे देखा और कहा:
अमाया (दृढ़ स्वर में):
“तो सुन लो, ऋषभ—
तुम नियम बना सकते हो,
पर इतिहास केवल नियमों से नहीं चलता।
इतिहास रक्त से चलता है।
और रक्त माँ से आता है।
तुम मुझे देवी कहकर कैद कर सकते हो,
पर मैं देवी नहीं, इतिहास बनूँगी।
और इतिहास को कोई मिटा नहीं सकता।”
यह कहकर वह मुड़ गई और सभा से बाहर निकल गई।
सभा मौन रह गई।
केवल ऋषभ की आँखों में क्रोध और असमंजस की चमक थी।
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