अध्याय 2 – दृश्य 4: वंश का प्रश्न
1. सभा का वातावरण
ऋतुगण की सभा में अब तक विवाह और गोत्र पर सहमति बन चुकी थी।
लेकिन सबसे कठिन प्रश्न अब सामने था — वंश किससे चलेगा?
दीपकों की लौ काँप रही थी, मानो स्वयं समय इस प्रश्न की गंभीरता को समझ रहा हो।
2. ऋषभ का कथन – पिता की अदृश्यता
ऋषभ खड़ा हुआ और सभा को संबोधित करते हुए बोला:
ऋषभ:
“अब तक संतान माँ के नाम से पहचानी जाती रही।
लोग कहते थे — ‘फलाँ अमाया का पुत्र’।
पर पिता?
वह तो अदृश्य हो जाता है, उसका नाम मिट जाता है।
यह अन्याय है।
वंश पिता से ही चलेगा, ताकि उसका नाम अमर हो।”
सभा में कई पुरुषों ने सिर हिलाकर सहमति जताई।
3. एक वृद्ध का विरोध – माँ ही जीवन का स्रोत
सभा में बैठे एक वृद्ध कृषक ने हाथ उठाकर कहा:
वृद्ध कृषक:
“पर संतान की उत्पत्ति स्त्री की कोख से होती है।
पिता का योगदान केवल बीज देने तक है।
बीज तो अनेक होते हैं,
पर उसे जीवन देने वाली भूमि — स्त्री है।
तो वंश का आधार भूमि होगी या बीज?”
सभा में सन्नाटा छा गया।
कुछ क्षणों तक केवल दीपक की टिमटिमाहट सुनाई देती रही।
4. ऋषभ का प्रतिवाद – शब्द ही इतिहास है
ऋषभ ने आगे बढ़कर कहा:
ऋषभ:
“जीवन माँ से आता है, मैं इसे नकारता नहीं।
पर इतिहास केवल जीवन से नहीं बनता।
इतिहास शब्दों से बनता है।
और शब्द पिता से जुड़ेंगे।
माँ रक्त देती है, पर पिता नाम देता है।
और नाम ही अमरत्व है।”
5. सभा में उथल-पुथल
कुछ लोग ऋषभ की बात पर सहमत हुए, कुछ असमंजस में पड़ गए।
एक व्यापारी:
“अगर हर संतान पिता से जुड़ेगी, तो वंश स्थायी होगा।
हर कुल की पहचान साफ़ होगी।”
दूसरा पुरुष (संशय में):
“पर स्त्री का क्या?
क्या उसका नाम मिटा दिया जाएगा?”
ऋषभ (कठोर स्वर में):
“नहीं, उसका नाम पूजा जाएगा।
वह देवी होगी।
पर इतिहास पिता से लिखा जाएगा।”
6. अमाया की अनुपस्थिति और उसकी गूँज
सभा में यह निर्णय लिया जा रहा था,
पर जिसकी कोख से जीवन आता था — अमाया — वह वहाँ उपस्थित नहीं थी।
फिर भी उसका मौन, उसका आक्रोश हर दीपक की लौ में महसूस हो रहा था।
7. दृश्य का समापन
सभा प्रमुख ने घोषणा की:
सभा प्रमुख:
“तो आज से वंश पिता से चलेगा।
माँ जीवन देगी,
पर नाम और इतिहास पिता से जुड़ेंगे।”
दीवारों पर काँपती छायाएँ गवाह थीं —
आज से सभ्यता एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी थी।
मातृसत्ता की जगह पितृसत्ता का बीज बो दिया गया था।
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