अध्याय 2 – दृश्य 6: सभा का समापन और नियम का स्थायीकरण
1. सभा में मौन
अमाया के क्रोधित शब्द मंडप की दीवारों पर गूँज रहे थे—
“मैं देवी नहीं, इतिहास बनूँगी।”
वह सभा से बाहर निकल गई थी, पर उसकी आवाज़ अब भी हर दीपक की लौ में कंपन पैदा कर रही थी।
कुछ क्षणों तक सभा मौन रही।
पुरुषों के चेहरों पर असमंजस था।
2. ऋषभ का हस्तक्षेप
ऋषभ धीरे-धीरे उठा और बोला:
ऋषभ:
“अमाया ने जो कहा, वह भावुकता है।
माँ जीवन देती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
पर सभ्यता को स्थिरता और व्यवस्था चाहिए।
और व्यवस्था तभी संभव है जब वंश पिता से जुड़ा हो, विवाह पवित्र अनुबंध बने, और गोत्र उसका चिन्ह हो।
हम भावनाओं से नहीं, नियमों से चलेंगे।”
सभा के अधिकांश पुरुषों ने सहमति में सिर हिलाया।
3. पुरोहित की पुष्टि
पुरोहित ने अपना आसन सँभालते हुए घोषणा की:
पुरोहित:
“तो यह आज से धर्म का विधान होगा—
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विवाह अनिवार्य होगा। स्त्री केवल एक पुरुष की होगी।
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गोत्र पिता से चलेगा और एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होगा।
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वंश अब पिता के नाम से पहचाना जाएगा।
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स्त्री देवी होगी, उसकी पूजा होगी, पर समाज के नियम पुरुष तय करेंगे।”
4. सभा की प्रतिक्रिया
सभा में बैठे पुरुषों की आँखों में संतोष झलक रहा था।
व्यापारी खुश थे कि वंश की स्थायी पहचान से व्यापार में स्थिरता आएगी।
योद्धा प्रसन्न थे कि उनके नाम और वंश अमर होंगे।
कुछ वृद्ध चुपचाप बैठे थे, उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, मानो वे भविष्य देख पा रहे हों।
5. नगर को संदेश
सभा प्रमुख ने आदेश दिया कि यह निर्णय नगर में ढोल बजाकर सुनाया जाए।
पहरेदारों ने बाहर जाकर घोषणा की—
“ऋतुगण की सभा ने आज से विवाह, गोत्र और वंश के नए नियम स्थापित किए हैं।
अब संतान पिता के नाम से जानी जाएगी।
देवी अमाया हमारी रक्षक हैं, पर नियम पुरुष-सभा के होंगे।”
नगर में शोर मच गया।
लोग आश्चर्य और उत्साह से एक-दूसरे को बताने लगे।
6. दृश्य का समापन
मंडप के भीतर दीपकों की लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी।
ऋषभ अकेले खड़ा था, उसकी आँखों में संतोष था।
वह मन ही मन बोला:
ऋषभ:
“आज से इतिहास बदल गया।
वंश पिता से चलेगा, और मेरा नाम अमर होगा।”
दीवारों पर छायाएँ काँप रही थीं,
मानो वे अमाया की आवाज़ दोहरा रही हों—
“मैं देवी नहीं, इतिहास बनूँगी।”
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