Thursday, August 28, 2025

दृश्य 1-2

अध्याय 1 – दृश्य 2: अमाया का मौन और आत्मसंवाद

सभा का शोर अब और भी बढ़ चुका था।
ढोल की थाप और शंखनाद की गूँज मिलकर ऐसा प्रतीत करा रहे थे जैसे स्वयं आकाश भी इस उत्सव में सम्मिलित हो।
लोग झूम-झूमकर नारे लगा रहे थे—
“देवी अमाया की जय! देवी अमाया की जय!”


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🌸 भीड़ का उत्साह

औरतें अपने बच्चों को गोद में उठाए, हाथ जोड़कर अमाया की ओर निहार रही थीं।
उनकी आँखों में विश्वास था कि अब उनकी खेती सुरक्षित रहेगी, उनके कुएँ सूखेंगे नहीं, और संतानों को देवी का आशीर्वाद मिलेगा।

कुछ बूढ़ी औरतें कह रही थीं—

पहली औरत:
“देखो, हमारी अमाया अब देवी बन गई है। उसकी कृपा से ही हमारी संतानें सुरक्षित रहेंगी।”

दूसरी औरत:
“हाँ बहन, अब अमाया से माँगेंगे तो सुख मिलेगा। वह अब हमारी रखवाली करेगी।”

पर उनकी बातों में कहीं भी यह प्रश्न नहीं था कि अमाया अब निर्णय ले भी पाएगी या नहीं।
उनके लिए पूजा ही सबसे बड़ा सहारा था।


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🌊 अमाया की स्थिति

मंच पर खड़ी अमाया एकदम शांत थी।
उसके पैरों पर फूल गिर रहे थे, पर उसका मन किसी और गहराई में डूबा हुआ था।
उसकी आँखें स्थिर थीं, पर भीतर वह कांप रही थी।

उसने धीरे से अपनी हथेली बंद की और मन ही मन बोली—

अमाया (आत्मसंवाद):
“ये पुष्प… ये जयकार… ये गीत…
सब मिलकर मुझे बाँध रहे हैं।
अब मैं निर्णय लेने वाली जननी नहीं,
बल्कि पूजा जाने वाली प्रतिमा हूँ।

क्या यही वह दिन था जिसका भय मुझे हमेशा से था?
मुझे देवी कहना… और निर्णयों से दूर कर देना?”


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🌑 स्मृतियों की गूँज

उसके मन में पिछले वर्षों की यादें उभर आईं—
जब नगर में किसी संकट पर सबसे पहले लोग उसी के पास आते थे।
किस खेत में बीज बोना है, किस कुएँ से पानी खींचना है,
कौन-सा सौदा स्वीकार करना है—सब उसी के निर्णय से तय होता था।

वह याद करती है—
कैसे लोग उसकी आँखों में देखकर आश्वस्त हो जाते थे।
आज वही लोग उसकी आँखों से बच रहे थे।
मानो वे जान रहे हों कि यह पूजा सम्मान नहीं, बल्कि एक छल है।


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🕯️ अमाया की देहभाषा

उसके होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में नमी।
उसने हाथ जोड़ लिए, जैसे जनता की श्रद्धा स्वीकार कर रही हो।
पर भीतर उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं।
उसके हृदय में हूक उठ रही थी—

अमाया (धीरे):
“यह सम्मान नहीं, यह मौन की सजा है।
वे मुझे ऊँचा उठा रहे हैं,
ताकि मुझे नीचे गिरा सकें।”


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👁️ ऋषभ की तलाश

जयकार के बीच उसकी आँखें भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ीं और एक जगह ठहर गईं।
वहाँ खड़ा था — ऋषभ।

ऋषभ भीड़ के शोर में शामिल नहीं था।
वह गंभीर होकर बस अमाया को देख रहा था।
उसकी आँखों में संतोष की हल्की-सी चमक थी।
मानो यह सब उसी की योजना का हिस्सा हो।

अमाया की देह अचानक कठोर हो गई।
उसकी आँखें गुस्से और पीड़ा से भर आईं।
वह मन ही मन बुदबुदाई—

अमाया:
“ऋषभ… तू मुझे देख रहा है।
तुझे पता है, यह जयकार मेरे लिए कैद है।
और फिर भी तू मौन है।
तेरा मौन ही तेरी साजिश है।”


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🎭 दृश्य का अंत

भीड़ की आवाज़ें और तेज़ हो गईं।
फूलों की वर्षा अब अमाया के चारों ओर ढेर की तरह जम गई थी।
वह ऊपर से देवी थी, पर भीतर टूट चुकी थी।

उसने आँखें बंद कर लीं।
अंधकार के बीच उसे केवल अपने ही शब्द सुनाई दिए—

अमाया (आत्मसंवाद):
“देवी बनाकर मुझे मौन कर दिया गया है।
पर यह मौन सदा के लिए नहीं रहेगा।
मेरे भीतर का इतिहास अब भी जीवित है।”

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