Thursday, August 28, 2025

दृश्य 1-3

अध्याय 1 – दृश्य 3: गुप्त सभा


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🏛️ सभा का स्थान

रात गहरी हो चुकी थी।
मोहनजोदड़ो की गलियाँ अब सुनसान थीं।
हवनकुंड की राख ठंडी हो रही थी और भीड़ अपने घर लौट चुकी थी।

लेकिन नगर के पश्चिमी हिस्से में, एक बड़े कक्ष में दीपक टिमटिमा रहे थे।
यहाँ इकट्ठा थे — नगर के पुरोहित, व्यापारी और पुरुष-सभा के सदस्य।
दीवारों पर मिट्टी के दीपकों की कतार जल रही थी, जिनका धुआँ वातावरण को और भी रहस्यमय बना रहा था।


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🔥 सभा का आरंभ

सभा प्रमुख ने चारों ओर देखा और गंभीर स्वर में बोला—

सभा प्रमुख:
“आज हमने अमाया को देवी बना दिया।
जनता प्रसन्न है, पर अब हमें अगला कदम सोचना है।
वंश अब तक माँ के नाम से चलता रहा…
अब हमें उसे पिता के नाम से जोड़ना है।”

सभा में सन्नाटा छा गया।
कुछ देर तक केवल दीपक की लौ की फड़फड़ाहट सुनाई देती रही।


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🗣️ ऋषभ का वक्तव्य

अचानक ऋषभ खड़ा हुआ।
उसकी आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।

ऋषभ:
“हाँ, यही सही समय है।
माँ से वंश चलना सभ्यता का प्रारंभ था।
पर इतिहास अधूरा रहा।
पिता मिट जाता है, अदृश्य हो जाता है।
जब तक नाम पुत्र से न जुड़े, पुरुष मरकर समाप्त हो जाता है।
मैं अदृश्य नहीं रहना चाहता।
कोई पुरुष अदृश्य न रहे, इसके लिए नियम बनाना ही होगा।”


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⚖️ मतभेद

सभा में बैठे एक वृद्ध व्यापारी ने आपत्ति जताई—

वृद्ध व्यापारी:
“परंतु लोग सदियों से अमाया जैसी स्त्रियों की सलाह पर ही चलते आए हैं।
मातृसत्ता ही हमारी व्यवस्था की रीढ़ है।
अगर हम इसे तोड़ देंगे तो लोग विरोध करेंगे।”

ऋषभ (कठोर स्वर में):
“विरोध? नहीं।
लोगों को बस पूजा चाहिए, निर्णय नहीं।
अगर हम अमाया को देवी बनाकर पूजा का केंद्र बना दें,
तो कोई उसके निर्णय नहीं माँगेगा।
वे केवल आशीर्वाद माँगेंगे।”

सभा के कई सदस्य सिर हिलाने लगे।


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📜 योजना

पुरोहित ने धीरे से कहा—

पुरोहित:
“तो हमें एक नया विधान लिखना होगा।
विवाह अनिवार्य होगा।
कोख पर पिता का अधिकार स्थापित होगा।
गोत्र बनेगा, वंश पिता से चलेगा।
और यह सब हम धर्म का आदेश कहकर लागू करेंगे।”

सभा में कुछ देर मौन छाया रहा।
फिर एक-एक कर सभी पुरुष बोले—

सदस्य:
“हाँ… यही होगा।”
“वंश अब पिता से चलेगा।”
“देवी का स्थान रहेगा, पर शासन पुरुष के हाथ में।”


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🌑 अमाया की अनुपस्थिति

इस सभा में केवल एक की अनुपस्थिति सबसे बड़ी थी — अमाया।
जिसके बारे में निर्णय लिया जा रहा था,
वह वहाँ उपस्थित ही नहीं थी।

ऋषभ ने दीपक की लौ को देखते हुए मन ही मन कहा—

ऋषभ (भीतर से):
“अमाया, तू मुझे प्रेम करती है,
पर मैं केवल प्रेम से संतुष्ट नहीं।
मुझे नाम चाहिए, अमरता चाहिए।
और इसके लिए मैं तुझे देवी बना दूँगा…
एक ऐसी देवी जो निर्णय नहीं ले सकेगी।”


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🎭 दृश्य का अंत

दीपक की लौ एक झोंके से काँप गई।
सभा समाप्त हुई।
पुरुष एक-एक कर बाहर निकल गए।

दीवार पर टंगी छाया मानो कह रही थी—
आज से इतिहास बदल दिया गया है।
और वह बदलाव किसी युद्ध से नहीं,
बल्कि एक गुप्त सभा से हुआ।

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