अध्याय 1 – दृश्य 1 (सभा का शोर) : विस्तृत संस्करण
मोहनजोदड़ो का पश्चिमी टीला उस दिन एक महोत्सव-स्थल में बदल गया था।
सूरज की पहली किरणें अभी धरती पर फैली भी न थीं कि नगर के लोग यहाँ इकट्ठा होने लगे।
स्त्रियाँ अपने बच्चों के हाथ थामे, सिर पर रंगीन चुनरियाँ ओढ़े आईं।
पुरुष, अपने कंधों पर पशुचर्म या सूती वस्त्र लपेटे, पंक्तिबद्ध खड़े हो रहे थे।
कुम्हार, लोहार, व्यापारी—सभी अपने काम छोड़कर आज की सभा में उपस्थित थे।
चारों ओर हवनकुंडों से उठता धुआँ, धूप की गंध, और ढोल-नगाड़ों की लगातार ध्वनि थी।
कुछ स्त्रियाँ गीत गा रही थीं—
“जननी अमाया, हमारी रक्षा कर… हमारे खेतों को हरा-भरा रख…”
बच्चे उनके पीछे-पीछे नाच रहे थे, मानो यह कोई पर्व हो।
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मंच की तैयारी
मंच मिट्टी और लकड़ी का बना था।
उस पर चढ़ने के लिए दोनों ओर सीढ़ियाँ थीं।
बीच में एक ऊँचा आसन रखा गया था, जिस पर अभी पुरोहित बैठने वाला था।
आसपास दीपक और कलश सजाए गए थे, जिनमें जल और आम्रपल्लव भरे थे।
सभा के पीछे खड़े कुछ युवक धीरे-धीरे फुसफुसा रहे थे।
पहला युवक (हँसते हुए):
“आज अमाया को देवी बनाया जाएगा।”
दूसरा युवक:
“देवी? लेकिन वह तो अब तक हमारी सभ्यता की जननी थी, निर्णय वही लेती थी।”
तीसरा युवक (फुसफुसाकर):
“अब से निर्णय ऋषभ और सभा लेंगे… अमाया तो केवल पूजा जाएगी।”
उनकी आँखों में उत्साह कम और कौतुहल अधिक था।
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देवी की घोषणा
भीड़ शांत हुई तो पुरोहित ने आसन पर बैठकर हाथ उठाया।
पुरोहित (गंभीर स्वर में):
“सभ्य जनों! आज का दिन हमारी नगरी के लिए पवित्र है।
आज हम अपनी जननी, अमाया को देवी घोषित करते हैं।
अब से उसकी पूजा होगी, उसके नाम पर दीप जलेंगे, और उसका आशीर्वाद हमारी संतानों को दिशा देगा।”
जैसे ही यह वाक्य पूरा हुआ, पूरी भीड़ गूँज उठी—
“देवी अमाया की जय! देवी अमाया की जय!”
फूलों की वर्षा शुरू हो गई।
ढोल और शंख की आवाज़ें मिलकर आकाश तक गूँजने लगीं।
औरतें लयबद्ध होकर गीत गाने लगीं।
बच्चे उछल-कूद कर हँसने लगे, उन्हें समझ भी नहीं था कि यह निर्णय उनके भविष्य को कैसे बदलेगा।
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अमाया की देहभाषा
मंच पर खड़ी अमाया एकदम स्थिर थी।
उसके वस्त्र सफेद थे जिनके किनारों पर लाल और नीले धागों की महीन कढ़ाई थी।
उसकी लटें खुले बालों की तरह हवा में उड़ रही थीं।
माथे पर हल्का-सा चंदन और गले में पुष्पहार था।
भीतर उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, पर बाहर उसका चेहरा निर्विकार था।
उसकी आँखें केवल एक ओर देख रही थीं—ऋषभ की ओर।
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अमाया का आत्मसंवाद
भीड़ के जयघोष के बीच अमाया की मनोभूमि बदल रही थी।
अमाया (मन ही मन):
“देवी? यह सम्मान है… या मुझे सत्ता से दूर करने का बहाना?
जब तक मैं ‘जननी’ थी, मैं निर्णय ले सकती थी।
अब ‘देवी’ बनकर मैं केवल पूजा जाऊँगी।
क्या यह पूजा है… या कैद?”
उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी—
पर यह मुस्कान श्रद्धा की नहीं, व्यंग्य की थी।
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ऋषभ की छाया
भीड़ के दाहिने कोने में ऋषभ खड़ा था।
उसका चेहरा गंभीर था, होंठ सख़्ती से बंद।
पर आँखों में संतोष की हल्की चमक थी।
वह जयघोष में शामिल नहीं हुआ, पर उसकी दृष्टि सीधी अमाया पर टिकी रही।
अमाया ने उसकी आँखों में देखा और भीतर काँप गई।
उसे लगा मानो यह भीड़ का उत्सव नहीं, बल्कि ऋषभ की योजना का परिणाम हो।
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दृश्य का अंत
शंखों और नगाड़ों की गूँज और बढ़ गई।
भीड़ झूमते हुए नारे लगा रही थी—
“देवी अमाया की जय! देवी अमाया की जय!”
अमाया ने अपनी आँखें बंद कीं।
उसके पैरों पर फूल गिर रहे थे।
भीतर उसका हृदय भारी था।
वह मन ही मन बोली—
“ऋषभ… यह सब तेरे कारण है।
तूने मुझे देवी बनाकर कैद कर दिया।”
और इस तरह, पूरे नगर की भीड़ के सामने,
अमाया को देवी बना दिया गया।
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