अध्याय 2 – दृश्य 3: गोत्र की स्थापना
1. सभा का वातावरण
ऋतुगण की सभा अब और भी गंभीर हो गई थी।
दीपकों का धुआँ धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था, और मंडप में बैठे हर पुरुष के चेहरे पर एक नया तनाव दिखाई दे रहा था।
विवाह पर सहमति बन चुकी थी, पर अब प्रश्न यह था कि वंश की पहचान कैसे होगी?
2. पुरोहित का प्रश्न
एक वृद्ध पुरोहित ने उठकर कहा—
पुरोहित:
“यदि विवाह का नियम बना दिया गया है, तो अब यह भी तय करना होगा कि संतान किसके नाम से जानी जाएगी।
माँ तो स्पष्ट है, पर पिता की पहचान कैसे स्थायी होगी?
इसके लिए हमें एक चिन्ह चाहिए — एक वंशानुक्रम का सूत्र।”
सभा में कुछ लोग फुसफुसाने लगे।
किसी ने कहा, “नाम से होगा,” तो किसी ने कहा, “पर नाम बदल सकता है।”
3. गोत्र का प्रस्ताव
वही पुरोहित फिर बोला:
पुरोहित:
“हमें चाहिए गोत्र।
गोत्र होगा वह ध्वज, वह निशान, जो हर संतान को उसके पिता से जोड़ेगा।
गोत्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगा।
और इस तरह पिता का नाम अमर होगा।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
सभी इस शब्द पर विचार करने लगे।
यह पहली बार था जब ‘गोत्र’ का विचार सामने आया।
4. नियमों की स्थापना
सभा प्रमुख ने आगे बढ़कर पूछा:
“और गोत्र के नियम क्या होंगे?”
पुरोहित ने स्पष्ट किया:
-
हर पुरुष अपने पुत्र को अपना गोत्र देगा।
-
एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होगा, ताकि रक्त की शुद्धता बनी रहे।
-
स्त्री विवाह के बाद पति के गोत्र में सम्मिलित होगी।
-
गोत्र को तोड़ना या बदलना पाप माना जाएगा।
5. सभा की प्रतिक्रिया
सभा में बैठे कई पुरुषों की आँखों में चमक आ गई।
एक योद्धा बोला:
“तो अब कोई संतान अनाम नहीं रहेगी।
हर बच्चा अपने पिता के नाम और गोत्र से पहचाना जाएगा।”
दूसरा व्यापारी बोला:
“और व्यापार में भी सुविधा होगी।
कौन किस वंश का है, यह तुरंत समझा जा सकेगा।”
लेकिन कुछ वृद्ध अब भी असमंजस में थे।
एक वृद्ध ने कहा:
“पर इससे स्त्री की पहचान मिट जाएगी।”
ऋषभ ने तत्काल उत्तर दिया:
“नहीं, स्त्री की पूजा होगी।
पर संतान का इतिहास पिता से चलेगा।
यही न्याय है।”
6. दृश्य का समापन
सभा प्रमुख ने घोषणा की—
सभा प्रमुख:
“तो आज से गोत्र हमारी सभ्यता का स्तंभ होगा।
हर संतान पिता के गोत्र से जानी जाएगी।
और यह नियम आने वाली पीढ़ियों तक अटल रहेगा।”
दीपकों की लौ कांप उठी।
दीवारों पर पड़ी छायाएँ मानो गवाही दे रही थीं कि
सभ्यता अब एक ऐसे बंधन में बंध चुकी है
जो युगों तक उसकी दिशा तय करेगा।
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