सबसे बड़ा व्यभिचारी
मनुष्य से बड़ा
व्यभिचारी
शायद ही कोई और
जीव होगा इस पृथ्वी पर।
जानवर
नंगे पैदा होते हैं,
नंगे जीते हैं,
नंगे मरते हैं —
फिर भी
उनका मन निर्वस्त्र नहीं होता।
मनुष्य
छुपता है —
वस्त्रों में,
नियमों में,
धर्म के पर्दों में,
और फिर भी
उसी पर्दे के पीछे
सबसे ज़्यादा
भटकता है।
कुत्ते के गले में पट्टा,
बैल के गले में घंटी,
घोड़े के पाँव में नाल —
यह
मनुष्य की सभ्यता है।
सभ्यता —
जिसने आज़ादी को
नियमों में बाँध दिया,
और फिर
उन नियमों को
अपने हित के लिए
तोड़ भी दिया।
मनुष्य ही है
जो पंछियों को पिंजरे में
खूबसूरती कहकर
कैद कर सकता है।
जानवरों की खाल पहनकर
इंसान होने का
गौरव महसूस कर सकता है।
और वही मनुष्य —
स्त्री के शरीर से डरता है।
वो स्त्री,
जो सदियों से
भाई, बेटा, भतीजा, देवर, ससुर, चाचा,
सबके सामने
सहज खड़ी रही।
लेकिन पुरुष —
उसे आंशिक अनावृत्त देखकर
भी
सहज नहीं हो सका।
वो अपनी दुर्बलता को
"चरित्रहीनता" कहकर
जायज़ ठहराता रहा।
और शब्द गढ़ता गया —
"व्यभिचार", "संस्कार", "मर्यादा"।
इसलिए
कभी चाचा, कभी मामा,
कभी भाई,
और आजकल
बाप भी।
कितनी विडंबना है —
कि सीमाएँ गढ़ने वाला मनुष्य
सीमाओं को ही लांघता रहा।
जबकि
जो सीमाओं से बाहर है,
वही तो
परमात्मा है।
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